भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2154

सम्मान-अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति-अवनति—ये पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार पग-पगपर प्राप्त होते हैं और प्रारब्धभोगके पश्चात् पुनः निवृत्त हो जाते हैं ।। १३ ।। आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् । गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ।। १४ ।। दुःख अपने ही किये हुए कर्मोंका फल है और सुख भी अपने ही पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम है। जीव माताकी गर्भशय्यामें आते ही पूर्व शरीरद्वारा उपार्जित सुख-दुःखका उपभोग करने लगता है ।। १४ ।। बालो युवा वा वृद्धश्च यत् करोति शुभाशुभम् । तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि ।। १५ ।। कोई बालक हो, तरुण हो या बूढ़ा हो, वह जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, जन्म-जन्मान्तरमें उसी अवस्थामें उस-उस कर्मका फल भोगता है ।। १५ ।। यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् । तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ।। १६ ।। जैसे बछड़ा हजारों गौओंमेंसे अपनी माँको पहचानकर उसे पा लेता है, वैसे ही पहलेका किया हुआ कर्म भी अपने कर्ताके पास पहुँच जाता है ।। १६ ।। मलिनं हि यथा वस्त्रं पश्चाच्छुद्ध्यति वारिणा । उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तकम् ।। १७ ।। जैसे मलिन हुआ वस्त्र पीछे जलसे धोनेपर शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार जो उपवासपूर्वक तपस्या करते हैं, (उनका अन्तःकरण शुद्ध होकर) उन्हें कभी समाप्त न होनेवाला महान् सुख मिलता है ।। १७ ।। दीर्घकालेन तपसा सेवितेन महामते । धर्मनिर्धूतपापानां संसिध्यन्ते मनोरथाः ।। १८ ।। महामते! दीर्घकालतक की हुई तपस्यासे तथा धर्माचरणद्वारा जिनके सारे पाप धुल गये हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं ।। १८ ।। शकुनानामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके । पदं यथा न दृश्येत तथा पुण्यकृतां गतिः ।। १९ ।। जैसे आकाशमें पक्षियोंके और जलमें मछलियोंके चरण-चिह्न दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार पुण्यात्मा ज्ञानियोंकी भी गतिका पता नहीं चलता ।। १९ ।। अलमन्यैरूपालब्धैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः । पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ।। २० ।। दूसरोंको उलाहना देने तथा लोगोंके अन्यान्य अपराधोंकी चर्चा करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। जो सुन्दर, अनुकूल और अपने लिये हितकर जान पड़े, वही कर्म करना चाहिये ।। २० ।।