महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2193, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदाज्ञापय विप्रर्षे ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १८ ॥ ‘तीनों लोकोंमें जो बात होती है या हो चुकी है, वह सब आपकी जानकारीमें है। ब्रह्मर्षे! बताइये, आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १८ ॥ यन्मया समनुष्ठेयं ब्रह्मर्षे तदुदाहर । विमुक्तस्येह शिष्यैर्मे नातिहृष्टमिदं मनः ॥ १९ ॥ ‘ब्रह्मर्षि नारद! इस समय मेरा जो कर्तव्य है, उसे भी बताइये। अपने प्यारे शिष्योंसे बिछुड़ जानेके कारण इस समय मेरा यह मन विशेष प्रसन्न नहीं है’ ॥ १९ ॥
नारद उवाच
अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् । मलं पृथिव्या वाहीकाः स्त्रीणां कौतूहलं मलम् ॥ २० ॥ नारदजीने कहा—व्यासजी! वेद पढ़कर उसका अभ्यास (पुनरावृत्ति) न करना वेदाध्ययनका दूषण है। व्रतका पालन न करना ब्राह्मणका दूषण है। वाहीक देशके लोग पृथ्वीके दूषण हैं और नये-नये खेल-तमाशा देखनेकी लालसा स्त्रीके लिये दोषकी बात है ॥ अधीयतां भवान् वेदान् सार्धं पुत्रेण धीमता । विधुन्वन् ब्रह्मघोषेण रक्षोभयकृतं तमः ॥ २१ ॥ आप अपने वेदोच्चारणकी ध्वनिसे राक्षसभयजनित अन्धकारका नाश करते हुए बुद्धिमान् पुत्र शुकदेवजीके साथ वेदोंका स्वाध्याय करते रहें ॥ २१ ॥
भीष्म उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा व्यासः परमधर्मवित् । तथेत्युवाच संहृष्टो वेदाभ्यासदृढव्रतः ॥ २२ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नारदजीकी बात सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और हर्षमें भरकर वे वेदाभ्यासरूपी व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करने लगे ॥ शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् । स्वरेणोच्चैः स शैक्ष्येण लोकानापूरयन्निव ॥ २३ ॥ उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवके साथ शिक्षाके नियमानुसार उच्चस्वरसे तीनों लोकोंको परिपूर्ण करते हुए-से वेदोंकी आवृत्ति आरम्भ कर दी ॥ २३ ॥ तयोरभ्यसतोरेव नानाधर्मप्रवादिनोः । वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवेजितः ॥ २४ ॥ नाना प्रकारके धर्मोंका प्रतिपादन करनेवाले वे पिता-पुत्र उक्त रूपसे वेदोंका अभ्यास कर ही रहे थे कि समुद्री हवासे प्रेरित होकर बड़े जोरकी आँधी चलने लगी ॥ २४ ॥ ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् ।