महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2194, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥ २५ ॥ तब अनध्याय-काल बताकर व्यासजीने अपने पुत्रको वेद पढ़नेसे उस समय रोक दिया। उनके मना करनेपर शुकदेवजीके मनमें इसका कारण जाननेके लिये प्रबल उत्कण्ठा हुई ॥ २५ ॥ अपृच्छत् पितरं ब्रह्मन् कुतो वायुरभूदयम् । आख्यातुमर्हसि भवान् वायोः सर्वं विचेष्टितम् ॥ २६ ॥ उन्होंने अपने पितासे पूछा—'ब्रह्मन्! इस वायुकी उत्पत्ति किससे हुई है? आप वायुकी सारी चेष्टाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन करें' ॥ २६ ॥ शुकस्यैतद् वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः । अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥ शुकदेवजीका यह वचन सुनकर व्यासजी अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे और अनध्यायके कारणपर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥ दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वयं ते निर्मलं मनः । तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्त्वे व्यवस्थितः ॥ २८ ॥ 'बेटा! तुम्हें स्वयं ही दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी है। तुम्हारा हृदय अत्यन्त निर्मल है। तुम रजोगुण और तमोगुणसे रहित होकर सत्त्वगुणमें प्रतिष्ठित हो ॥ २८ ॥ आदर्शे स्वामिव च्छायां पश्यस्यात्मानमात्मना । व्यस्यात्मनि स्वयं वेदान् बुद्ध्या समनुचिन्तय ॥ २९ ॥ 'जैसे लोग दर्पणमें अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं, उसी प्रकार तुम बुद्धिके द्वारा आत्माका साक्षात्कार करते हो; अतः स्वयं ही वेदोंको अपने भीतर स्थापित करके बुद्धिद्वारा अनध्यायके कारणभूत वायुके विषयमें विचार करो ॥ २९ ॥ देवयानचरो विष्णोः पितृयाणश्च तामसः । द्वावेतौ प्रेत्य पन्थानौ दिवं चाधश्च गच्छतः ॥ ३० ॥ 'मरकर ऊपरके लोकोंमें जानेवाले और नीचेके लोकोंमें जानेवाले मनुष्योंके लिये दो मार्ग हैं, एक तो देवयान जो कि विष्णुलोकका मार्ग है, अतः सात्त्विक है, दूसरा पितृयान जो कि तामस है ॥ ३० ॥ पृथिव्यामन्तरिक्षे च यत्र संवान्ति वायवः । सप्तैते वायुमार्गा वै तान् निबोधानुपूर्वशः ॥ ३१ ॥ 'पृथ्वीपर या आकाशमें जहाँ भी हवा चलती है, उसके बहनेके लिये सात मार्ग हैं। तुम क्रमशः उनका वर्णन सुनो ॥ ३१ ॥ तत्र देवगणाः साध्या महाभूता महाबलाः । तेषामप्यभवत् पुत्रः समानो नाम दुर्जयः ॥ ३२ ॥