भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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किरणोंसे युक्त जान पड़ते हैं तथा जिससे अमृतकी दिव्य निधि चन्द्रमाका भी पोषण होता

है, वह विजयशीलोंमें श्रेष्ठ छठा वायुतत्त्व 'परिवह' नामसे प्रसिद्ध है ।। ४६–४८ ।।

सर्वप्राणभृतां प्राणान् योऽन्तकाले निरस्यति ।

यस्य वर्त्मानुवर्तन्ते मृत्युवैवस्वतावुभौ ।। ४९ ।।

सम्यगन्वीक्षतां बुद्ध्या शान्तयाध्यात्मनित्यया ।

ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते ।। ५० ।।

यं समासाद्य वेगेन दिशोऽन्तं प्रतिपेदिरे ।

दक्षस्य दशपुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः ।। ५१ ।।

येन स्पृष्टः पराभूतो यात्येव न निवर्तते ।

परावहो नाम परो वायुः स दुरतिक्रमः ।। ५२ ।।

'जो वायु अन्तकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणोंको शरीरसे निकालता है, जिसके इस

प्राणनिष्कासनरूप मार्गका मृत्यु तथा वैवस्वत यम अनुगमनमात्र करते हैं, सदा

अध्यात्मचिन्तनमें लगी हुई शान्त बुद्धिके द्वारा भलीभाँति अनुसंधान करनेवाले तथा

ध्यानके अभ्यासमें ही सानन्द रत रहनेवाले पुरुषोंको जो अमृतत्व देनेमें समर्थ है, जिसमें

स्थित होकर प्रजापति दक्षके दस हजार पुत्र सम्पूर्ण दिशाओंके अन्तमें पहुँच गये तथा

जिससे स्पर्शित होकर विलीन हुआ प्राणी यहाँसे केवल जाता है वापस नहीं लौटता, उस

सर्वश्रेष्ठ सप्तम वायुका नाम 'परावह' है। उसका अतिक्रमण करना सभीके लिये सर्वथा

कठिन है ।। ४९–५२ ।।

एवमेते दितेः पुत्रा मारुताः परमाद्भुताः ।

अनारतं ते संवान्ति सर्वगाः सर्वधारिणः ।। ५३ ।।

'इस प्रकार ये सात मरुद्गण दितिके अत्यन्त अद्भुत पुत्र हैं। इनकी सर्वत्र गति है। ये

निरन्तर बहते और सबको धारण करते हैं ।। ५३ ।।

एतत् तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः ।

कम्पितः सहसा तेन वायुनातिप्रवायता ।। ५४ ।।

'यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि अत्यन्त वेगसे बहते हुए उस वायुके द्वारा यह पर्वतोंमें

श्रेष्ठ हिमालय भी सहसा काँप उठा है ।। ५४ ।।

विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः ।

सहसोदीर्यते तात जगत् प्रव्यथते तदा ।। ५५ ।।

'तात! यह भगवान् विष्णुका निःश्वास है। जब कभी सहसा वह निःश्वास वेगसे निकल

पड़ता है, उस समय यह सारा जगत् व्यथित हो उठता है ।। ५५ ।।

तस्माद् ब्रह्मविदो वेदान् नाधीयन्तेऽतिवायति ।

वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् ।। ५६ ।।