महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2196, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहवाले कर देता है, वह महान् वायु 'उद्वह' कहलाता है, जो तृतीय मार्गपर चलनेके कारण तीसरा कहा गया है ॥ ३८-४० ॥ समूह्यमाना बहुधा येन नीताः पृथग् घनाः । वर्षमोक्षकृतारम्भास्ते भवन्ति घनाघनाः ॥ ४१ ॥ संहता येन चाविद्धा भवन्ति नदतां नदाः । रक्षणार्थाय सम्भूता मेघत्वमुपयान्ति च ॥ ४२ ॥ योऽसौ वहति भूतानां विमानानि विहायसा । चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः ॥ ४३ ॥ 'जिसके द्वारा इधर-उधर ले जाये गये अनेक प्रकारके महामेघ घटा बाँधकर जल बरसाना आरम्भ करते हैं, घटाके रूपमें घनीभूत होनेपर भी जिसकी प्रेरणासे सारे बादल फट जाते हैं, फिर वे वेणुनादके समान शब्द करनेके कारण 'नद' कहलाते हैं तथा प्राणियोंकी रक्षाके लिये पुनः जलका संग्रह करके घनीभूत हो जाते हैं, जो वायु देवताओंके आकाशमार्गसे जानेवाले विमानोंको स्वयं ही वहन करता है, वह पर्वतोंका मान मर्दन करनेवाला चतुर्थ वायु 'संवह' नामसे प्रसिद्ध है ॥ ४१—४३ ॥ येन वेगवता रुग्णा रूक्षेण रुवता नगान् । वायुना सहिता मेघास्ते भवन्ति बलाहकाः ॥ ४४ ॥ दारुणोत्पातसंचारो नभसः स्तनयित्नुमान् । पञ्चमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः ॥ ४५ ॥ 'जो रूक्षभावसे वेगपूर्वक महान् शब्दके साथ बहकर बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ देता और उखाड़ फेंकता है तथा जिसके द्वारा संगठित हुए प्रलयकालीन मेघ 'बलाहक' संज्ञा धारण करते हैं, जिस वायुका संचरण भयानक उत्पात लानेवाला होता है तथा जो आकाशसे अपने साथ मेघोंकी घटाएँ लिये चलता है, उस अत्यन्त वेगशाली पंचम वायुको 'विवह' नाम दिया गया है ॥ ४४-४५ ॥ यस्मिन् पारिप्लवा दिव्या वहन्त्यापो विहायसा । पुण्यं चाकाशगङ्गायास्तोयं विष्टभ्य तिष्ठति ॥ ४६ ॥ दूरात् प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः । योनिरंशुसहस्रस्य येन भाति वसुन्धरा ॥ ४७ ॥ यस्मादाप्यायते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च । षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जयतां वरः ॥ ४८ ॥ 'जिस वायुके आधारपर आकाशमें दिव्य जल ऊपर-ही-ऊपर प्रवाहित होते हैं, जो आकाशगंगाके पवित्र जलको धारण करके स्थित है और जिसके द्वारा दूरसे ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणोंके उत्पत्तिस्थान सूर्यदेव, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है, एक ही