भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2204, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2204

जन्म लेता है ॥ २५ ॥ तत्र मृत्युजरादुःखै सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यते जन्तुस्तत्कथं नावबुद्ध्यसे ॥ २६ ॥ उन-उन योनियोंमें जीवको सदा जरा-मृत्यु और नाना प्रकारके दुःखोंसे संतप्त होना पड़ता है। इस प्रकार संसारमें जन्म लेनेवाला प्रत्येक प्राणी संतापकी आगमें पकाया जाता है—इस बातकी ओर तुम क्यों नहीं ध्यान देते? ॥ २६ ॥ अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः । अनर्थे चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थं नावबुद्ध्यसे ॥ २७ ॥ तुमने अहितमें ही हित-बुद्धि कर ली है, जो अध्रुव (विनाशशील) वस्तुएँ हैं, उन्हींको 'ध्रुव' (अविनाशी) नाम दे रखा है और अनर्थमें ही तुम्हें अर्थका बोध हो रहा है। यह बात तुम्हारी समझमें क्यों नहीं आती? ॥ २७ ॥ संवेष्ट्यमानं बहुभिर्मोहात् तन्तुभिरात्मजैः । कोषकार इवात्मानं वेष्टयन् नावबुध्यसे ॥ २८ ॥ जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही शरीरसे उत्पन्न हुए तन्तुओंद्वारा अपने-आपको आच्छादित कर लेता है, उसी प्रकार तुम भी मोहवश अपनेहीसे उत्पन्न सम्बन्धके बन्धनोंद्वारा अपने-आपको बाँधते जा रहे हो तो भी यह बात तुम्हारी समझमें नहीं आ रही है ॥ २८ ॥ अलें परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः । कृमिर्हि कोषकारस्तु बध्यते स परिग्रहात् ॥ २९ ॥ यहाँ विभिन्न वस्तुओंके संग्रहकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संग्रहसे महान् दोष प्रकट होता है। रेशमका कीड़ा अपने संग्रह-दोषके कारण ही बन्धनमें पड़ता है ॥ २९ ॥ पुत्रदारकुटुम्बेषु सक्ताः सीदन्ति जन्तवः । सरःपङ्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव ॥ ३० ॥ स्त्री-पुत्र और कुटुम्बमें आसक्त रहनेवाले प्राणी उसी प्रकार कष्ट पाते हैं, जैसे जंगलके बूढ़े हाथी तालाबके दलदलमें फँसकर दुःख उठाते हैं ॥ ३० ॥ महाजालसमाकृष्टान् स्थले मत्स्यानिवोद्धृतान् । स्नेहजालसमाकृष्टान् पश्य जन्तून् सुदुःखितान् ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार महान् जालमें फँसकर पानीसे बाहर आये हुए मत्स्य तड़पते हैं, उसी प्रकार स्नेहजालसे आकृष्ट होकर अत्यन्त कष्ट उठाते हुए इन प्राणियोंकी ओर दृष्टिपात करो ॥ ३१ ॥ कुटुम्बं पुत्रदारांश्च शरीरं संचयाश्च ये । पारक्यमध्रुवं सर्वं किं स्वं सुकृतदुष्कृतम् ॥ ३२ ॥

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