भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2205, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2205

संसारमें कुटुम्ब, स्त्री, पुत्र, शरीर और संग्रह—सब कुछ पराया है। सब नाशवान् है। इसमें अपना क्या है, केवल पाप और पुण्य ।। ३२ ।। यदा सर्वं परित्यज्य गन्तव्यमवशेन ते । अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि ।। ३३ ।। जब सब कुछ छोड़कर तुम्हें यहाँसे विवश होकर चल देना है, तब इस अनर्थमय जगत्में क्यों आसक्त हो रहे हो? अपने वास्तविक अर्थ—मोक्षका साधन क्यों नहीं करते हो? ।। ३३ ।। अविश्रान्तमनालम्बमपाथेयमदैशिकम् । तमःकान्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि ।। ३४ ।। जहाँ ठहरनेके लिये कोई स्थान नहीं, कोई सहारा देनेवाला नहीं, राहखर्च नहीं तथा अपने देशका कोई साथी अथवा राह बतानेवाला नहीं है, जो अन्धकारसे व्याप्त और दुर्गम है, उस मार्गपर तुम अकेले कैसे चल सकोगे? ।। न हि त्वां प्रस्थितं कश्चित् पृष्ठतोऽनुगमिष्यति । सुकृतं दुष्कृतं च त्वां यास्यन्तमनुयास्यति ।। ३५ ।। जब तुम परलोककी राह लोगे, उस समय तुम्हारे पीछे कोई नहीं जायगा। केवल तुम्हारा किया हुआ पुण्य या पाप ही वहाँ जाते समय तुम्हारा अनुसरण करेगा ।। ३५ ।। विद्या कर्म च शौचं च ज्ञानं च बहुविस्तरम् । अर्थार्थमनुसार्यन्ते सिद्धार्थश्च विमुच्यते ।। ३६ ।। अर्थ (परमात्मा) की प्राप्तिके लिये ही विद्या, कर्म, पवित्रता और अत्यन्त विस्तृत ज्ञानका सहारा लिया जाता है। जब कार्यकी सिद्धि (परमात्माकी प्राप्ति) हो जाती है, तब मनुष्य मुक्त हो जाता है ।। ३६ ।। निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः । छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ।। ३७ ।। गाँवोंमें रहनेवाले मनुष्यकी विषयोंके प्रति जो आसक्ति होती है, वह उसे बाँधनेवाली रस्सीके समान है। पुण्यात्मा पुरुष उसे काटकर आगे—परमार्थके पथपर बढ़ जाते हैं; किंतु जो पापी हैं, वे उसे नहीं काट पाते ।। ३७ ।। रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गन्धपङ्कां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुरावहाम् ।। ३८ ।। क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यवटारकाम् । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां नौतार्यां तां नदीं तरेत् ।। ३९ ।। यह संसार एक नदीके समान है, जिसका उपादान या उद्गम सत्य है, रूप इसका किनारा, मन स्रोत, स्पर्श द्वीप और रस ही प्रवाह है, गन्ध उस नदीकी कीचड़, शब्द जल और स्वर्गरूपी दुर्गम घाट है। शरीररूपी नौकाकी सहायतासे उसे पार किया जा सकता है।

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