महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! नारदजी सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते थे; अतः वे शीघ्रगामी मुनि बदरिकाश्रमके उस विशाल प्रदेशमें घूमते-घामते आ पहुँचे, जो महान् प्राणियोंसे युक्त था॥ तयोराह्निकवेलायां तस्य कौतूहलं त्वभूत्। इदं तदास्पदं कृत्स्नं यस्मिंल्लोकाः प्रतिष्ठिताः॥ १५॥ सदेवासुरगन्धर्वाः सकिन्नरमहोरगाः। जब वहाँ भगवान् नर और नारायणके नित्यकर्मका समय हुआ, उसी समय नारदजीके मनमें उनके दर्शनके लिये बड़ी उत्कण्ठा हुई। वे सोचने लगे, ‘अहो! यह उन्हीं भगवान्का स्थान है, जिनके भीतर देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर और महान् नागोंसहित सम्पूर्ण लोक निवास करते हैं॥ एका मूर्तिरियं पूर्वं जाता भूयश्चतुर्विधा॥ १६॥ धर्मस्य कुलसंताने धर्मदिभिर्विवर्धितः। अहो ह्यनुगृहीतोऽद्य धर्म एभिः सुरैरिह॥ १७॥ नरनारायणाभ्यां च कृष्णेन हरिणा तथा। ‘पहले ये एक ही रूपमें विद्यमान थे; फिर धर्मकी वंश-परम्पराका विस्तार करनेके लिये ये चार विग्रहोंमें प्रकट हुए। इन चारोंने अपने उपार्जित धर्मसे धर्मदेवकी वंश-परम्पराको बढ़ाया है। अहो! इस समय नर, नारायण, कृष्ण और हरि—इन चारों देवताओंने धर्मपर बड़ा अनुग्रह किया है॥ १६-१७ १/२॥ अत्र कृष्णो हरिश्चैव कस्मिंश्चित् कारणान्तरे॥ १८॥ स्थितौ धर्मोत्तरौ ह्येतौ तथा तपसि धिष्ठितौ। ‘इनमेंसे हरि और कृष्ण किसी और कार्यमें संलग्न हैं; परंतु ये दोनों भाई नारायण और नर धर्मको ही प्रधान मानते हुए तपस्यामें संलग्न हैं॥ १८ १/२॥ एतौ हि परमं धाम काऽनयोराह्निकक्रिया॥ १९॥ पितरौ सर्वभूतानां दैवतं च यशस्विनौ। कां देवतां तु यजतः पितॄन् वा कान् महामती॥ २०॥ ‘ये ही दोनों परमधामस्वरूप हैं। इनका यह नित्यकर्म कैसा है? ये दोनों यशस्वी देवता सम्पूर्ण प्राणियोंके पिता और देवता हैं। ये परम बुद्धिमान् दोनों बन्धु भला किस देवताका यजन और किन पितरोंका पूजन करते हैं?’॥ १९-२०॥ इति संचिन्त्य मनसा भक्त्या नारायणस्य तु। सहसा प्रादुरभवत् समीपे देवयोस्तदा॥ २१॥ मन-ही-मन ऐसा सोचकर भगवान् नारायणके प्रति भक्तिसे प्रेरित हो नारदजी सहसा उन देवताओंके समीप प्रकट हो गये॥ २१॥ कृते दैवे च पित्र्ये च ततस्ताभ्यां निरीक्षितः। पूजितश्चैव विधिना यथाप्रोक्तेन शास्त्रतः॥ २२॥