भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2265, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2265

'राजेन्द्र! हमारे चिन्तनसे तुम्हें वसुधाराकी प्राप्ति होगी, जिससे ग्लानि तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी और इस पातालमें रहते हुए भी तुम्हें भूख और प्यासका कष्ट नहीं होगा; क्योंकि वसुधाराका पान करनेसे तुम्हारे तेजकी वृद्धि होती रहेगी। हमारे वरदानसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न हो तुम्हें ब्रह्मलोकमें ले जायँगे'॥ एवं दत्त्वा वरं राज्ञे सर्वे ते च दिवौकसः । गताः स्वभवनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ २८ ॥ इस प्रकार राजाको वरदान देकर वे सब देवता तथा तपोधन ऋषि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २८ ॥ चक्रे वसुस्ततः पूजां विष्वक्सेनाय भारत । जप्यं जगौ च सततं नारायणमुखोद्गतम् ॥ २९ ॥ भारत! तदनन्तर वसुने भगवान् विष्वक्सेनकी पूजा आरम्भ की और भगवान् नारायणके मुखसे प्रकट हुए जपनीय मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) का निरन्तर जप करने लगे ॥ २९ ॥ तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिंदम । अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ॥ ३० ॥ शत्रुदमन युधिष्ठिर! वहाँ पातालके विवरमें रहते हुए भी राजा उपरिचर पाँच समय पाँच यज्ञोंद्वारा देवेश्वर श्रीहरिकी आराधना करते थे ॥ ३० ॥ ततोऽस्य तुष्टो भगवान् भक्त्या नारायणो हरिः । अनन्यभक्तस्य सततस्तत्परस्य जितात्मनः ॥ ३१ ॥ उन्होंने अपने मनको जीत लिया था और वे सदा भगवान्‌के भजनमें ही लगे रहते थे। अपने उस अनन्य भक्तकी भक्तिसे भगवान् श्रीनारायण हरि बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३१ ॥ वरदो भगवान् विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् । गरुत्मन्तं महावेगमाबभाषेप्सितं तदा ॥ ३२ ॥ फिर उन वरदायक भगवान् विष्णुने अपने पास ही खड़े हुए महान् वेगशाली पक्षिराज गरुड़से अपनी अभीष्ट बात इस प्रकार कही— ॥ ३२ ॥ द्विजोत्तम महाभाग पश्यतां वचनान्मम । सम्राड् राजा वसुर्नाम धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ३३ ॥ 'महाभाग पक्षिप्रवर! तुम मेरी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मा सम्राट् राजा वसुके पास जाकर उन्हें देखो ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणानां प्रकोपेन प्रविष्टो वसुधातलम् । मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ॥ ३४ ॥ 'पक्षिराज! वे ब्राह्मणोंके कोपसे पातालमें प्रविष्ट हुए हैं। फिर भी उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका सदा सम्मान ही किया है; अतः तुम उनके पास जाओ ॥ ३४ ॥

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