महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2266, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडेह ममाज्ञया । अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु मा चिरम् ॥ ३५ ॥ ‘गरुड! पृथ्वीके विवरमें सुरक्षितरूपसे रहनेवाले इन पातालचारी नृपश्रेष्ठ वसुको तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही आकाशचारी बना दो’ ॥ ३५ ॥
गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् । विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते पार्थिवो वसुः ॥ ३६ ॥ यह आज्ञा पाकर वायुके समान वेगशाली गरुड अपने दोनों पंख फैलाकर उड़े और पातालमें जहाँ राजा वसु विराजमान थे, घुस गये ॥ ३६ ॥
तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः । उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ॥ ३७ ॥ विनतानन्दन गरुड सहसा राजाको वहाँसे ऊपर उठाकर तुरंत आकाशमें ले उड़े और वहीं इन्हें छोड़ दिया ॥ ३७ ॥
अस्मिन् मुहूर्ते संजज्ञे राजोपरिचरः पुनः । सशरीरो गतश्चैव ब्रह्मलोकं नृपोत्तमः ॥ ३८ ॥ उसी क्षण राजा वसु पुनः उपरिचर हो गये। फिर वे नृपश्रेष्ठ सशरीर ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ ३८ ॥
एवं तेनापि कौन्तेय वाग्दोषाद् देवताज्ञया । प्राप्ता गतिरधस्तात् तु द्विजशापान्महात्मना ॥ ३९ ॥ कुन्तीनन्दन! इस प्रकार उस महामनस्वी नरेशने भी देवताओंकी आज्ञासे वाचिक अपराध करनेके कारण ब्राह्मणोंके शापसे अधोगति प्राप्त की थी ॥ ३९ ॥
केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरीरीश्वरः । ततः शीघ्रं जहौ शापं ब्रह्मलोकमवाप च ॥ ४० ॥ फिर उन्होंने केवल पुरुषप्रवर भगवान् श्रीहरिका सेवन किया, जिससे वे उस शापसे शीघ्र ही छूट गये और ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ४० ॥
भीष्म उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं सम्भूता मानवा यथा । नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः । तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ४१ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! श्वेतद्वीपके निवासी पुरुष जैसे हैं, उनकी सारी स्थिति मैंने तुमसे कह सुनायी। अब देवर्षि नारद जिस प्रकार श्वेतद्वीपमें गये, वह सब प्रसंग तुमसे कहूँगा। तुम एकचित्त होकर सुनो ॥