भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2270

सलिलपते (जलके स्वामी), ३३-पृथ्वीपते, ३४-दिक्पते, ३५-पूर्वनिवास (महाप्रलयके समय जगत्के आधाररूप), ३६-गुह्य (स्वरूप), ३७-ब्रह्मपुरोहित, ३८-ब्रह्मकायिक, ३९-महाराजिक, ४०-चातुर्महाराजिक, ४१-भासुर (प्रकाशमान), ४२-महाभासुर (महाप्रकाशमान), ४३-सप्तमहाभाग, ४४-याम्य, ४५-महायाम्य, ४६-संज्ञासंज्ञ, ४७-तुषित, ४८-महातुषित, ४९-प्रमर्दन (मृत्युरूप), ५०-परिनिर्मित, ५१-अपरिनिर्मित, ५२-वशवर्ती, ५३-अपरिनिन्दित (शमदम आदि गुणसम्पन्न), ५४-अपरिमित (अनन्त), ५५-वशवर्ती, ५६-अवशवर्ती, ५७-यज्ञ, ५८-महायज्ञ, ५९-यज्ञसम्भव, ६०-यज्ञयोनि (वेदस्वरूप), ६१-यज्ञगर्भ, ६२-यज्ञहृदय, ६३-यज्ञस्तुत, ६४-यज्ञभागहर, ६५-पञ्चयज्ञ, ६६-पञ्चकालकर्तृपति (अहोरात्र, मास, ऋतु, अयन और संवत्सररूप कालके स्वामी), ६७-पाञ्चरात्रिक, ६८-वैकुण्ठ (परमधाम), ६९-अपराजित, ७०-मानसिक, ७१-नानामिक (जिनमें सब नामोंका समावेश है), ७२-परस्वामी (परमेश्वर), ७३-सुस्नात, ७४-हंस, ७५-परमहंस, ७६-महाहंस, ७७-परमयाज्ञिक, ७८-सांख्ययोगरूप, ७९-सांख्यमूर्ति (ज्ञानमूर्ति), ८०-अमृतेशय (विष्णु), ८१-हिरण्येशय, ८२-देवेशय, ८३-कुशेशय, ८४-ब्रह्मेशय, ८५-पद्मेशय (विष्णु), ८६-विश्वेश्वर और ८७-विष्वक्सेन आदि आपहीके नाम हैं। ८८-आप ही जगदन्वय (जगत्में ओत-प्रोत) तथा ८९-आप ही जगत्के कारणस्वरूप हैं। ९०-अग्नि आपका मुख है। ९१-आप ही बड़वानल, ९२-आप ही आहुतिरूप, ९३-सारथि, ९४-वषट्कार, ९५-ओङ्कार, ९६-तपःस्वरूप, ९७-मनःस्वरूप, ९८-चन्द्रमास्वरूप, ९९-चक्षुके देवता सूर्य आप ही हैं। १००-सूर्य, १०१-दिग्गज, १०२-दिग्भानु (दिशाओंको प्रकाशित करनेवाले), १०३-विदिग्भानु (विदिशाओंको प्रकाशित करनेवाले) तथा १०४-हयग्रीवरूप हैं। १०५-आप प्रथम त्रिसौपर्ण मन्त्र, १०६-ब्राह्मणादि वर्णोंको धारण करनेवाले तथा १०७-पंचाग्निरूप है। १०८-नाचिकेत नामसे प्रसिद्ध त्रिविध अग्नि भी आप ही हैं। १०९-आप शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, निरुक्त और ज्योतिष नामक छः अंगोंके भण्डार हैं। ११० प्राग्ज्योतिषस्वरूप, १११-ज्येष्ठ सामगस्वरूप आप ही हैं। ११२-सामिक व्रतधारी, ११३-अथर्वशिरा, ११४-पञ्चमहाकल्परूप (आप ही सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव और वैष्णव शास्त्रोंके उपास्यदेव) हैं। ११५-फेनपाचार्य, ११६-वालखिल्य मुनिरूप, ११७-वैखानस मुनिरूप आप ही हैं। ११८-अभग्नयोग (अखण्डयोग), ११९-अभग्नपरिसंख्यान (अखण्ड विचार), १२०-युगादि (युगके आदिरूप), १२१-युगमध्य (युगके मध्यरूप), १२२-युगान्त (युगके अन्तरूप आप ही हैं), १२३-आखण्डल (इन्द्र), १२४-आप ही प्राचीनगर्भ, १२५-कौशिकमुनि, १२६-पुरुष्टुत (सबके द्वारा प्रचुर स्तुति करने योग्य), १२७-पुरुहूत, १२८-विश्वकृत (विश्वके रचयिता), १२९-विश्वरूप, १३०-अनन्तगति, १३१-अनन्तभोग, १३२-आपका न तो अन्त है, १३३-न आदि, १३४-न मध्य, १३५-अव्यक्तमध्य, १३६-अव्यक्तनिधन, १३७-व्रतावास (व्रतके आश्रय), १३८-समुद्रवासी (क्षीरसागरशायी), १३९-यशोवास, (यशके निवासस्थान), १४०-तपोवास (तपके निवासस्थान), १४१-दमावास (संयमके आधार),