महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2271, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२-लक्ष्मीनिवास, १४३-विद्याके आश्रय, १४४-कीर्तिके आधार, १४५-सम्पत्तिके आश्रय, १४६-सर्वावास (सबके निवासस्थान), १४७-वासुदेव, १४८-सर्वच्छन्दक (सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले), १४९-हरिहय, १५०-हरिमेध (अश्वमेधयज्ञरूप), १५१-महायज्ञभागहर, १५२-वरप्रद (भक्तोंको वरदान देनेवाले), १५३-सुखप्रद (सबको सुख प्रदान करनेवाले), १५४-धनप्रद (सबको धन देनेवाले), १५५-हरिमेध (भगवद्दत्त भी आप ही हैं), १५६-यम, १५७-नियम, १५८-महानियम आदि साधन भी आप ही हैं। १५९-कृच्छ्र, १६०-अतिकृच्छ्र, १६१-महाकृच्छ्र, १६२-सर्वकृच्छ्र आदि चान्द्रायणव्रत भी आप ही हैं। १६३-नियमधर (नियमोंको धारण करनेवाले), १६४-निवृत्तभ्रम (भ्रमरहित), १६५-प्रवचनगत (वेदवाक्यके विषय), १६६-पृश्निगर्भप्रवृत्त, १६७-प्रवृत्तवेदक्रिय (वैदिक कर्मोंकि प्रवर्तक), १६८-अज (जन्मरहित), १६९-सर्वगति (सर्वव्यापी), १७०-सर्वदर्शी, १७१-अग्राह्य, १७२-अचल, १७३-महाविभूति (सृष्टिरूप विभूतिवाले), १७४-माहात्म्यशरीर (अतुलित प्रभावशाली स्वरूपवाले), १७५-पवित्र, १७६-महापवित्र (पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले), १७७-हिरण्मय, १७८-बृहद् (ब्रह्म), १७९-अप्रतर्क्य (तर्कसे जाननेमें न आनेवाले), १८०-अविज्ञेय, १८१-ब्रह्माग्रय, १८२-प्रजाकी सृष्टि करनेवाले, १८३-प्रजाका अन्त करनेवाले, १८४-महामायाधर, १८५-चित्रशिखण्डी, १८६-वरप्रद, १८७-पुरोडाश भागको ग्रहण करनेवाले, १८८-गताध्वर (प्राप्तयज्ञ), १८९-छिन्नतृष्ण (तृष्णारहित), १९०-छिन्नसंशय (संशयरहित), १९१-सर्वतोवृत्त (सर्वव्यापक), १९२-निवृत्तिरूप, १९३-ब्राह्मणरूप, १९४-ब्राह्मणप्रिय, १९५-विश्वमूर्ति, १९६-महामूर्ति, १९७-बान्धव (जगत्के बन्धु), १९८-भक्तवत्सल तथा १९९-ब्रह्मण्यदेव आदि नामोंसे पुकारे जानेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है। मैं आपका भक्त हूँ। आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। २००-एकान्तमें दर्शन देनेवाले आप परमात्माको बारंबार नमस्कार है।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३३८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३३८ ।।