महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2275, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरेंगे ।। २० ।। न दृश्यश्चक्षुषा योऽसौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च । न घ्रेयश्चैव गन्धेन रसेन च विवर्जितः ।। २१ ।। सत्त्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै । यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ।। २२ ।। भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न विनश्यति । अजो नित्यः शाश्वतश्च निर्गुणो निष्कलस्तथा ।। २३ ।। द्विर्द्वादशेभ्यस्तत्त्वेभ्यः ख्यातो यः पञ्चविंशकः । पुरुषो निष्क्रियश्चैव ज्ञानदृश्यश्च कथ्यते ।। २४ ।। यं प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता वै द्विजसत्तमाः । स वासुदेवो विज्ञेयः परमात्मा सनातनः ।। २५ ।। ‘जो नेत्रोंसे देखा नहीं जाता, त्वचासे जिसका स्पर्श नहीं होता, गन्ध ग्रहण करनेवाली घ्राणेन्द्रियसे जो सूँघनेमें नहीं आता, जो रसनेन्द्रियकी पहुँचसे परे है; सत्त्व, रज और तम नामक गुण जिसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते, जो सर्वव्यापी, साक्षी और सम्पूर्ण जगत्का आत्मा कहलाता है, सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जानेपर भी जो स्वयं नष्ट नहीं होता है, जिसे अजन्मा, नित्य, सनातन, निर्गुण और निष्कल बताया गया है, जो चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्वके रूपमें विख्यात है, जिसे अन्तर्यामी पुरुष, निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रोंसे ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज यहाँ मुक्त हो जाते हैं, वही सनातन परमात्मा है। उसीको वासुदेव नामसे जानना चाहिये ।। २१—२५ ।।
पश्य देवस्य माहात्म्यं महिमानं च नारद । शुभाशुभैः कर्मभिर्यो न लिप्यति कदाचन ।। २६ ।। ‘नारद! उस परमात्मदेवका माहात्म्य और महिमा तो देखो, जो शुभाशुभ कर्मोंसे कभी लिप्त नहीं होता है ।। २६ ।।
सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणानेतान् प्रचक्षते । यत्ते सर्वशरीरेषु तिष्ठन्ति विचरन्ति च ।। २७ ।। ‘सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण बताये जाते हैं, जो सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित रहते हैं और विचरते हैं ।।
एतान् गुणांस्तु क्षेत्रज्ञो भुङ्क्ते नैभिः स भुज्यते । निर्गुणो गुणभुक् चैव गुणस्रष्टा गुणाधिकः ।। २८ ।। ‘इन गुणोंको क्षेत्रज्ञ स्वयं भोगता है, किंतु इन गुणोंके द्वारा वह क्षेत्रज्ञ भोगा नहीं जाता; क्योंकि वह निर्गुण, गुणोंका भोक्ता, गुणोंका स्रष्टा तथा गुणोंसे उत्कृष्ट है ।। २८ ।।
जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते । ज्योतिष्यापः प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते ।। २९ ।।