महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2276, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘देवर्षे! यह सम्पूर्ण जगत् जिसपर प्रतिष्ठित है, वह पृथिवी जलमें विलीन हो जाती है। जलका तेजमें और तेजका वायुमें लय होता है ॥ २९ ॥
खे वायुः प्रलयं याति मनस्याकाशमेव च ।
मनो हि परमं भूतं तदव्यक्ते प्रलीयते ॥ ३० ॥
‘वायुका आकाशमें लय होता है, आकाश मनमें विलीन होता है। मन उत्कृष्ट भूत है। वह अव्यक्त प्रकृतिमें लीन होता है ॥ ३० ॥
अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्क्रिये सम्प्रलीयते ।
नास्ति तस्मात् परतरः पुरुषाद् वै सनातनात् ॥ ३१ ॥
‘ब्रह्मन्! अव्यक्तका निष्क्रिय पुरुषमें लय होता है। उस सनातन पुरुषसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥ ३१ ॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम् ।
ऋते तमेकं पुरुषं वासुदेवं सनातनम् ॥ ३२ ॥
‘संसारमें उस एकमात्र सनातन पुरुष वासुदेवको छोड़कर कोई भी चराचर भूत नित्य नहीं है ॥ ३२ ॥
सर्वभूतात्मभूतो हि वासुदेवो महाबलः ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ ३३ ॥
‘महाबली वासुदेव सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत हैं ॥
ते समेता महात्मानः शरीरमिति संज्ञितम् ।
तदा विशति यो ब्रह्मन्नदृश्यो लघुविक्रमः ॥ ३४ ॥
‘वे सब महाभूत एक साथ मिलकर ही शरीर नाम धारण करते हैं। ब्रह्मन्! उस समय अदृश्यभावसे जो शीघ्रगामी चेतन उसमें प्रवेश करता है, वही जीवात्मा है ॥ ३४ ॥
उत्पन्न एव भवति शरीरं चेष्टयन् प्रभुः ।
न विना धातुसंघातं शरीरं भवति क्वचित् ॥ ३५ ॥
‘उसका शरीरमें प्रवेश करना ही उत्पन्न होना बताया जाता है। वही शरीरको चेष्टाशील बनाता है। वही इसके संचालनमें समर्थ है। कहीं भी पाँचों भूतोंके मिलित समुदायके बिना कोई शरीर नहीं होता ॥ ३५ ॥
न च जीवं विना ब्रह्मन् वायवश्चेष्टयन्त्युत ।
स जीवः परिसंख्यातः शेषः संकर्षणः प्रभुः ॥ ३६ ॥
‘ब्रह्मन्! जीवके बिना प्राणवायु चेष्टा नहीं करती। वह जीव ही शेष या भगवान् संकर्षण कहा गया है ॥ ३६ ॥
तस्मात् सनत्कुमारत्वं योऽलभत् स्वेन कर्मणा ।
यस्मिंश्च सर्वभूतानि प्रलयं यान्ति संक्षयम् ॥ ३७ ॥