महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2277, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस मनः सर्वभूतानां प्रद्युम्नः परिपठ्यते ।
‘जो उसी संकर्षण अथवा जीवसे उत्पन्न होकर अपने कर्म (ध्यान, पूजन आदि) के द्वारा सनत्कुमारत्व (जीवन्मुक्ति) प्राप्त कर लेता है, जिसमें समस्त प्राणी लय एवं क्षयको प्राप्त होते हैं, वह सम्पूर्ण भूतोंका मन ही ‘प्रद्युम्न’ कहलाता है ।। ३७ ½ ।।
तस्मात् प्रसूतो यः कर्ता कारणं कार्यमेव च ।। ३८ ।।
‘उस प्रद्युम्नसे जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह (अहंकार ही) तन्मात्रा आदिका कर्ता, परम्परा-सम्बन्धसे महाभूतोंका कारण तथा महत्तत्त्वका कार्य है ।। ३८ ।।
तस्मात् सर्वं सम्भवति जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
सोऽनिरुद्धः स ईशानो व्यक्तः स सर्वकर्मसु ।। ३९ ।।
‘उसीसे समस्त चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है। वही ‘अनिरुद्ध’ एवं ‘ईशान’ कहलाता है। वह (कर्तृत्वके अभिमानरूपसे) सम्पूर्ण कर्मोंमें व्यक्त होता है ।। ३९ ।।
यो वासुदेवो भगवान् क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ।
ज्ञेयः स एव राजेन्द्र जीवः संकर्षणः प्रभुः ।। ४० ।।
संकर्षणाच्च प्रद्युम्नो मनोभूतः स उच्यते ।
प्रद्युम्नाद् योऽनिरुद्धस्तु सोऽहंकारः स ईश्वरः ।। ४१ ।।
‘राजेन्द्र! जो भगवान् वासुदेव क्षेत्रज्ञस्वरूप एवं निर्गुणरूपसे जाननेयोग्य बताये गये हैं, वे ही प्रभावशाली संकर्षणरूप जीवात्मा हैं। संकर्षणसे प्रद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ है, जो मनोमय कहलाते हैं। प्रद्युम्नसे जो अनिरुद्ध प्रकट हुए हैं, वे ही अहंकार और ईश्वर हैं ।। ४०-४१ ।।
मत्तः सर्वं सम्भवति जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
अक्षरं च क्षरं चैव सच्चासचै़व नारद ।। ४२ ।।
‘नारद! मुझसे ही समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्की उत्पत्ति होती है। क्षर और अक्षर तथा असत् और सत् भी मुझसे ही प्रकट हुए हैं ।। ४२ ।।
मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम ।
अहं हि पुरुषो ज्ञेयो निष्क्रियः पञ्चविंशकः ।। ४३ ।।
‘यहाँ जो मेरे भक्त हैं, वे मुझमें ही प्रवेश करके मुक्त होते हैं। मैं ही पचीसवें तत्त्व निष्क्रिय पुरुषरूपसे जानने योग्य हूँ ।। ४३ ।।
निर्गुणो निष्कलश्चैव निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
एतत् त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते ।। ४४ ।।
इच्छन् मुहूर्तान्निश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः ।
‘मैं निर्गुण, निष्कल, द्वन्द्वोंसे अतीत और परिग्रहसे शून्य हूँ। तुम ऐसा न समझ लेना कि ये रूपवान् हैं, इसलिये दिखायी देते हैं; क्योंकि मैं इच्छा करते ही एक ही क्षणमें अदृश्य हो सकता हूँ; क्योंकि मैं सम्पूर्ण जगत्का ईश्वर और गुरु हूँ ।। ४४ ½ ।।