भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2279

तपांसि नियमांश्चैव यमानपि पृथग्विधान् ॥ ५४ ॥ 'मेरे पृष्ठभागमें भी दृष्टिपात करो, जहाँ नासत्य और दस्र—ये दोनों देववैद्य अश्विनीकुमार स्थित हैं। इनके सिवा मेरे विभिन्न अंगोंमें समस्त प्रजापतियों, सप्तर्षियों, सम्पूर्ण वेदों, सैकड़ों यज्ञों, ओषधियों तथा अमृतको भी देखो। तप तथा नाना प्रकारके यम-नियम भी यहाँ मूर्तिमान् हैं ॥ ५३-५४ ॥

तथाष्टगुणमैश्वर्यमेकस्थं पश्य मूर्तिमत् । श्रियं लक्ष्मीं च कीर्तिं च पृथिवीं च ककुद्मिनीम् ॥ ५५ ॥ वेदानां मातरं पश्य मत्स्थां देवीं सरस्वतीम् । ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठं पश्य नारद खेचरम् ॥ ५६ ॥ 'आठ प्रकारके ऐश्वर्य भी यहाँ एक ही जगह साकाररूपसे प्रकट हैं, इन्हें देखो। श्री, लक्ष्मी, कीर्ति, पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा वेदमाता सरस्वतीदेवी भी मेरे भीतर विराजमान हैं, उन सबका दर्शन करो। नारद! ये नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी ध्रुव दिखायी दे रहे हैं, इनकी ओर भी दृष्टिपात करो ॥ ५५-५६ ॥

अम्भोधरान् समुद्रांश्च सरांसि सरितस्तथा । मूर्तिमन्तः पितृगणांश्चतुरः पश्य सत्तम ॥ ५७ ॥ 'साधुशिरोमणे! बादल, समुद्र, सरोवर और सरिताओंको भी मेरे भीतर मूर्तिमान् देख लो। चारों प्रकारके पितृगण भी सशरीर प्रकट हैं, इनका भी दर्शन कर लो ॥ ५७ ॥

त्रींश्चैवेमान् गुणान् पश्य मत्स्थान् मूर्तिविवर्जितान् । देवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ५८ ॥ 'मेरे शरीरमें स्थित हुए मूर्तिरहित इन तीन गुणोंको भी मूर्तिमान् देख लो। मुने! देवकार्यसे भी पितृकार्य बढ़कर है ॥ ५८ ॥

देवानां च पितॄणां च पिता ह्येकोऽहमादितः । अहं हयशिरा भूत्वा समुद्रे पश्चिमोत्तरे ॥ ५९ ॥ पिबामि सुहुतं हव्यं कव्यं च श्रद्धयान्वितम् । 'एकमात्र मैं ही देवताओं और पितरोंका भी पिता हूँ। मैं ही हयग्रीवरूप धारण करके समुद्रमें वायव्यकोणकी ओर रहता हूँ और विधिपूर्वक हवन किये हुए हव्य और श्रद्धापूर्वक समर्पित किये हुए कव्यका भी पान करता हूँ ॥ ५९ १/२ ॥

मया सृष्टः पुरा ब्रह्मा मां यज्ञमयजत् स्वयम् ॥ ६० ॥ ततस्तस्मिन् वरान् प्रीतो दत्तवानस्म्यनुत्तमान् । 'पूर्वकालमें मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये ब्रह्माने स्वयं ही मुझ यज्ञपुरुषका यजन किया था। इससे प्रसन्न होकर मैंने उन्हें उत्तम वरदान दिये थे ॥ ६० १/२ ॥

मत्पुत्रत्वं च कल्पादौ लोकाध्यक्षत्वमेव च ॥ ६१ ॥ अहंकारकृतं चैव नाम पर्यायवाचकम् ।