भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2283

तदनन्तर देवताओंके कार्यके लिये नरसिंहरूप धारण करके यज्ञनाशक दितिनन्दन हिरण्यकशिपुका संहार कर डालूँगा॥ ७८ १/२॥ विरोचनस्य बलवान् बलिः पुत्रो महासुरः॥ ७९॥ अवध्यः सर्वलोकानां सदेवासुररक्षसाम्। भविष्यति स शक्रं वा स्वराज्याच्च्यावयिष्यति॥ ८०॥ विरोचनके एक बलवान् पुत्र होगा, जो महासुर बलिके नामसे विख्यात होगा। उसे देवता, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोक भी नहीं मार सकेंगे। वह इन्द्रको राज्यसे भ्रष्ट कर देगा॥ ७९-८०॥ त्रैलोक्येऽपहृते तेन विमुखे च शचीपतौ। अदित्यां द्वादशादित्यः सम्भविष्यामि कश्यपात्॥ ८१॥ जब वह त्रिलोकीका अपहरण कर लेगा और शचीपति इन्द्र युद्धमें पीठ दिखाकर भाग जायेंगे, उस समय मैं कश्यपजीके अंश और अदितिके गर्भसे बारहवाँ आदित्य वामन बनकर प्रकट होऊँगा॥ ८१॥ (जटी गत्वा यज्ञसदः स्तूयमानो द्विजोत्तम। यज्ञस्तवं करिष्यामि श्रुत्वा प्रीतो भवेद् बलिः॥ द्विजश्रेष्ठ! उस समय सब लोग मेरी स्तुति करेंगे और मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके रूपमें बलिके यज्ञमण्डपमें जाकर उसके उस यज्ञकी भूरि-भूरि प्रशंसा करूँगा, जिसे सुनकर बलि बहुत प्रसन्न होगा॥ किमिच्छसि वटो ब्रूहीत्युक्तो याचे महद् वरम्। दीयतां त्रिपदीमात्रमिति याचे महासुरम्॥ जब वह कहेगा कि 'ब्रह्मचारी ब्राह्मण! बताओ, क्या चाहते हो?' तब मैं उससे महान् वरकी याचना करूँगा। मैं उस महान् असुरसे कहूँगा कि 'मुझे तीन पग भूमिमात्र दे दो'॥ स दद्यान्मयि सम्प्रीतः प्रतिषिद्धश्च मन्त्रिभिः। यावज्जलं हस्तगतं त्रिभिर्विक्रमणैर्वृतम्॥) ततो राज्यं प्रदास्यामि शक्रायामिततेजसे। देवताः स्थापयिष्यामि स्वस्वस्थानेषु नारद॥ ८२॥ वह अपने मन्त्रियोंके मना करनेपर भी मुझपर प्रसन्न होनेके कारण वह वर मुझे दे देगा। ज्यों ही संकल्पका जल मेरे हाथपर आयेगा, त्यों ही तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापकर उसका सारा राज्य अमिततेजस्वी इन्द्रको समर्पित कर दूँगा। नारद! इस प्रकार मैं सम्पूर्ण देवताओंको अपने-अपने स्थानोंपर स्थापित कर दूँगा॥ बलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम्। दानवं च बलिं श्रेष्ठमवध्यं सर्वदैवतैः॥ ८३॥