महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2282, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊपर लाता हूँ' ।। ७६ ।।
(भीष्म उवाच
नारदस्त्वथ पप्रच्छ भगवन्तं जनार्दनम् ।
केषु केषु च भावेषु त्वं द्रष्टव्यो महाप्रभो ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर नारदजीने भगवान् जनार्दनसे पूछा—'महाप्रभो! किन-किन स्वरूपोंमें आपका दर्शन (और स्मरण) करना चाहिये? ।।
श्रीभगवानुवाच
शृणु नारद तत्त्वेन प्रादुर्भावान् महामुने ।
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामनः ।।
रामो रामश्च रामश्च कृष्णः कल्की च ते दश ।
श्रीभगवान् बोले—महामुनि नारद! तुम मेरे अवतारोंके नाम सुनो—मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, बलराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि—ये दस अवतार हैं ।।
पूर्वं मीनो भविष्यामि स्थापयिष्याम्यहं प्रजाः ।।
लोकान् वेदान् धरिष्यामि मज्जमानान् महार्णवे ।
पहले मैं 'मत्स्य' रूपसे प्रकट होऊँगा और समस्त प्रजाको निर्भय अवस्थामें स्थापित करूँगा। महासागरमें डूबते हुए लोकों और वेदोंकी भी रक्षा करूँगा ।।
द्वितीयं कूर्मरूपं मे हेमकूटनिभं सुत ।।
मन्दरं धारयिष्यामि अमृतार्थे द्विजोत्तम ।
वत्स! मेरा दूसरा अवतार होगा कूर्म—कच्छप। उस समय मैं हेमकूट पर्वतके समान कच्छपरूप धारण करूँगा। द्विजश्रेष्ठ! जब देवता अमृतके लिये क्षीरसागरका मन्थन करेंगे, तब मैं अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण करूँगा ।।
मग्नां महार्णवे घोरे भाराक्रान्तामिमं पुनः ।।)
सत्त्वैराक्रान्तसर्वाङ्गां नष्टां सागरमेखलाम् ।
आनयिष्यामि स्वस्थानं वाराहं रूपमास्थितः ।। ७७ ।।
हिरण्याक्षं वधिष्यामि दैतेयं बलगर्वितम् ।
जिसके सारे अंग प्राणियोंसे भरे हुए हैं तथा जो समुद्रसे घिरी हुई है, वही यह पृथ्वी जब भारी भारसे दबकर घोर महासागरमें निमग्न हो जायगी, उस समय मैं वाराहरूप धारण करके इसे पुनः अपने स्थानपर ला दूँगा। उसी समय बलके घमंडमें भरे हुए हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध कर डालूँगा ।। ७७ १/२ ।।
नारसिंहं वपुः कृत्वा हिरण्यकशिपुं पुनः ।। ७८ ।।
सुरकार्ये हनिष्यामि यज्ञघ्नं दितिनन्दनम् ।