महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएषोऽहं व्यक्तिमागत्य तिष्ठामि दिवि शाश्वतः ।
ततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत् पुनः ॥ ७० ॥
‘इस समय मैं सनातन परमात्मा ही व्यक्तरूप धारण करके आकाशमें स्थित हूँ। फिर एक सहस्र चतुर्युग व्यतीत होनेपर मैं ही इस जगत्का संहार करूँगा ॥ ७० ॥
कृत्वाऽऽत्मस्थानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
एकाकी विद्यया सार्धं विहरिष्ये जगत् पुनः ॥ ७१ ॥
‘उस समय सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंको अपनेमें लीन करके मैं अकेला ही अपनी विद्या-शक्ति के साथ सूने संसारमें विहार करूँगा ॥ ७१ ॥
ततो भूयो जगत् सर्वं करिष्यामीह विद्यया ।
अस्मिन् मूर्तिश्चतुर्थी या सासृजच्छेषमव्ययम् ॥ ७२ ॥
‘तदनन्तर सृष्टिका समय आनेपर फिर उस विद्याशक्तिके ही द्वारा संसारके सारे चराचर प्राणियोंकी सृष्टि करूँगा। मेरी जो चार मूर्तियाँ हैं, उनमें जो चौथी वासुदेव मूर्ति है, उसने अविनाशी शेषको उत्पन्न किया है ॥ ७२ ॥
स हि संकर्षणः प्रोक्तः प्रद्युम्नं सोऽप्यजीजनत् ।
प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽहं सर्गो मम पुनः पुनः ॥ ७३ ॥
‘उस शेषको ही संकर्षण कहा गया है। संकर्षणने प्रद्युम्नको प्रकट किया है और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका आविर्भाव हुआ है। वह सब मैं ही हूँ। बारंबार उत्पन्न होनेवाला यह सृष्टि विस्तार मेरा ही है ॥ ७३ ॥
अनिरुद्धात् तथा ब्रह्मा तन्नाभिकमलोद्भवः ।
ब्रह्मणः सर्वभूतानि चराणि स्थावराणि च ॥ ७४ ॥
‘मेरी अनिरुद्ध मूर्तिसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए हैं, जिनका प्राकट्य मेरे नाभिकमलसे हुआ है। ब्रह्मासे समस्त चराचर भूत उत्पन्न हुए हैं ॥ ७४ ॥
एतां सृष्टिं विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुनः ।
यथा सूर्यस्य गगनादुदयास्तमने इह ॥ ७५ ॥
‘कल्पके आदिमें बारंबार इस सृष्टिको मैं प्रकट करता हूँ (और अन्तमें इसका संहार कर डालता हूँ)। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। जैसे आकाशसे सूर्यका उदय होता है और आकाशमें ही वह अस्त होता है—ये उदय-अस्तके क्रम सदा चलते रहते हैं (उसी प्रकार मुझसे ही जगत्की उत्पत्ति होती है और मुझमें ही उसका लय होता है। यह सृष्टि और संहारका क्रम यों ही चला करता है) ॥ ७५ ॥
नष्टे पुनर्बलात् काल आनयत्यमितद्युतिः ।
तथा बलादहं पृथ्वीं सर्वभूतहिताय वै ॥ ७६ ॥
‘जैसे अमिततेजस्वी काल सूर्यके अदृश्य होनेपर पुनः बलपूर्वक उसे दृष्टिपथमें ला देता है, उसी प्रकार मैं भी समस्त प्राणियोंके हितके लिये इस पृथ्वीको समुद्रके जलसे बलपूर्वक