भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2297

हुआ। अतः मैं तुम्हारे संदेहके निवारणके लिये उत्तम एवं न्यायोचित बात कहूँगा। तुमलोग ध्यान देकर सुनो ।। २६-२७ ।।

यथा वृत्तं हि कल्पादौ दृष्टं मे ज्ञानचक्षुषा । परमात्मेति यं प्राहुः सांख्ययोगविदो जनाः ।। २८ ।। महापुरुषसंज्ञां स लभते स्वेन कर्मणा । तस्मात् प्रसूतम्व्यक्तं प्रधानं तं विदुर्बुधाः ।। २९ ।। 'कल्पके आदिमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था और जिसे मैंने ज्ञानदृष्टिसे देखा था, वह सब बता रहा हूँ। सांख्य और योगके विद्वान् जिन्हें परमात्मा कहते हैं, वे ही अपने कर्मके प्रभावसे महापुरुष नाम धारण करते हैं। उन्हींसे अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई है, जिसे विद्वान् पुरुष प्रधानके नामसे भी जानते हैं ।। २८-२९ ।।

अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् । अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मेति कथ्यते ।। ३० ।। 'जगत्की सृष्टिके लिये उन्हीं महापुरुष और अव्यक्तसे व्यक्तकी उत्पत्ति हुई, जिसे सम्पूर्ण लोकोंमें अनिरुद्ध एवं महान् आत्मा कहते हैं ।। ३० ।।

योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ।। ३१ ।। 'व्यक्तभावको प्राप्त हुए उन्हीं अनिरुद्धने पितामह ब्रह्माकी सृष्टि की। वे ब्रह्मा सम्पूर्ण तेजोमय हैं और उन्हींको समष्टि अहंकार कहा गया है ।। ३१ ।।

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । अहंकार प्रसूतानि महाभूतानि पञ्चधा ।। ३२ ।। 'पृथ्‍वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये पाँच सूक्ष्म महाभूत अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं ।। ३२ ।।

महाभूतानि सृष्ट्वैव तान् गुणान् निर्ममे पुनः । भूतेभ्यश्चैव निष्पन्ना मूर्तिमन्तश्च तान् शृणु ।। ३३ ।। 'अहंकारस्वरूप ब्रह्माने पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टि करके फिर उनके शब्द-स्पर्श आदि गुणोंका निर्माण किया। उन भूतोंसे जो मूर्तिमान् प्राणी उत्पन्न हुए, उनके नाम सुनो ।। ३३ ।।

मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महात्मा वै मनुः स्वायम्भुवस्तथा ।। ३४ ।। 'मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, महात्मा वसिष्ठ और स्वायम्भुव मनु ।। ३४ ।।

ज्ञेयाः प्रकृतयोऽष्टौ ता यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः । वेदवेदाङ्गसंयुक्तान् यज्ञान् यज्ञाङ्गसंयुतान् ।। ३५ ।।