भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2296

सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पैल—इन तीनके सिवा व्यासजीका चौथा शिष्य मैं ही हूँ और पाँचवें शिष्य उनके पुत्र शुकदेव माने गये हैं॥ १९ ½ ॥

एतान् समागतान् सर्वान् पञ्च शिष्यान् दमान्वितान् ॥ २० ॥ शौचाचारसमायुक्तान् जितक्रोधान् जितेन्द्रियान् । वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ॥ २१ ॥ ये पाँचों शिष्य इन्द्रियदमन एवं मनोनिग्रहसे सम्पन्न, शौच तथा सदाचारसे संयुक्त, क्रोधशून्य और जितेन्द्रिय हैं। अपनी सेवामें आये हुए इन सभी शिष्योंको व्यासजीने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन कराया॥

मेरौ गिरिवरे रम्ये सिद्धचारणसेविते । तेषामभ्यस्यतां वेदान् कदाचित् संशयोऽभवत् ॥ २२ ॥ एष वै यस्त्वया पृष्टस्तेन तेषां प्रकीर्तितः । ततः श्रुतो मया चापि तवाख्येयोऽद्य भारत ॥ २३ ॥ सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिवर मेरुके रमणीय शिखरपर वेदाभ्यास करते हुए हम सब शिष्योंके मनमें किसी समय यही संदेह उत्पन्न हुआ, जिसे आज तुमने पूछा है। भारत! व्यासजीने हम शिष्योंको जो उत्तर दिया, उसे मैंने भी उन्हींके मुखसे सुना था। वही आज तुम्हें भी बताना है॥ २२-२३॥

शिष्याणां वचनं श्रुत्वा सर्वाज्ञानतमोनुदः । पराशरसुतः श्रीमान् व्यासो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥ अपने शिष्योंका संशययुक्त वचन सुनकर सबके अज्ञानान्धकारका निवारण करनेवाले पराशरनन्दन श्रीमान् व्यासजीने यह बात कही—॥ २४॥

मया हि सुमहत् तप्तं तपः परमदारुणम् । भूतं भव्यं भविष्यं च जानीयामिति सत्तमाः ॥ २५ ॥ ‘साधु पुरुषोंमें श्रेष्ठ शिष्यगण! एक समयकी बात है कि मैंने भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त कठोर और बड़ी भारी तपस्या की॥ २५॥

तस्य मे तप्ततपसो निगृहीतेन्द्रियस्य च । नारायणप्रसादेन क्षीरोदस्यानुकूलतः ॥ २६ ॥ त्रैकालिकमिदं ज्ञानं प्रादुर्भूतं यथेप्सितम् । तच्छृणुध्वं यथान्यायं वक्ष्ये संशयमुत्तमम् ॥ २७ ॥ ‘जब मैं इन्द्रियोंको वशमें करके अपनी तपस्या पूर्ण कर चुका, तब भगवान् नारायणके कृपाप्रसादसे क्षीरसागरके तटपर मुझे मेरी इच्छाके अनुसार यह तीनों कालोंका ज्ञान प्राप्त