भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2295, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2295

जो लोग नियत कालतक प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलोंको लक्ष्य करके प्रवृत्तिमार्गका आश्रय लेते हैं, उन कर्मपरायण पुरुषोंके लिये यही सबसे बड़ा दोष है कि वे कालकी सीमामें आबद्ध रहकर ही कर्मका फल भोग करते हैं ॥ १३ ॥ एतन्मे संशयं विप्र हृदि शल्यमिवार्पितम् । छिन्धीतिहासकथनात् परं कौतूहलं हि मे ॥ १४ ॥ विप्रवर! यह संशय मेरे हृदयमें काँटेके समान चुभता है। आप इतिहास सुनाकर मेरे संदेहका निवारण करें। मेरे मनमें इस विषयको जाननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ १४ ॥ कथं भागहराः प्रोक्ता देवताः क्रतुषु द्विज । किमर्थं चाध्वरे ब्रह्मन्निज्यन्ते त्रिदिवौकसः ॥ १५ ॥ द्विजश्रेष्ठ! देवताओंको यज्ञोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बताया गया है? ब्रह्मन्! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवताओंकी ही यज्ञमें किसलिये पूजा की जाती है? ॥ १५ ॥ ये च भागं प्रगृह्णन्ति यज्ञेषु द्विजसत्तम । ते यजन्तो महायज्ञैः कस्य भागं ददन्ति वै ॥ १६ ॥ ब्राह्मणशिरोमणे! जो यज्ञोंमें भाग ग्रहण करते हैं, वे देवता जब स्वयं महायज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, तब किसको भाग समर्पित करते हैं? ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

अहो गूढतमः प्रश्नस्त्वया पृष्टो जनेश्वर । नातप्ततपसा ह्येष नावेदविदुषा तथा ॥ १७ ॥ नापुराणविदा चैव शक्यो व्याहर्तुमञ्जसा । **वैशम्पायनजीने कहा—**जनेश्वर! तुमने बड़ा गूढ़ प्रश्न उपस्थित किया है। जिसने तपस्या नहीं की है तथा जो वेदों और पुराणोंका विद्वान् नहीं है, वह मनुष्य अनायास ही ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ १७१/२ ॥ हन्त ते कथयिष्यामि यन्मे पृष्टः पुरा गुरुः ॥ १८ ॥ कृष्णद्वैपायनो व्यासो वेदव्यासो महार्षिः । अब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। पूर्वकालमें मेरे पूछनेपर वेदोंका विस्तार करनेवाले गुरुदेव महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने जो कुछ बताया था, वही मैं तुमसे कहूँगा ॥ १८१/२ ॥ सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः ॥ १९ ॥ अहं चतुर्थः शिष्यो वै पञ्चमश्च शुकः स्मृतः ।