भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2294, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2294

सामने वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥ श्रुत्वा माहात्म्यमेतस्य देहिनां परमात्मनः । जनमेजयो महाप्राज्ञो वैशम्पायनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ परम बुद्धिमान् जनमेजयने समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप इन परमात्मा नारायणदेवका माहात्म्य सुनकर उनसे इस प्रकार कहा ॥ ६ ॥ जनमेजय उवाच इमे सब्रह्मका लोकाः ससुरासुरमानवाः । क्रियास्वभ्युदयोक्तासु सक्ता दृश्यन्ति सर्वशः ॥ ७ ॥ जनमेजय बोले—मुने! ब्रह्मा, देवगण, असुरगण तथा मनुष्योंसहित ये समस्त लोक लौकिक अभ्युदयके लिये बताये गये कर्मोंमें ही आसक्त देखे जाते हैं ॥ ७ ॥ मोक्षश्चोक्तस्त्वया ब्रह्मन् निर्वाणं परमं सुखम् । ये तु मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिताः ॥ ८ ॥ ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्तीह शुश्रुम । ब्रह्मन्! परंतु आपने मोक्षको परम शान्ति एवं परम सुखस्वरूप बताया है। जो मुक्त होते हैं, वे पुण्य और पापसे रहित हो सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले भगवान् नारायणदेवमें प्रवेश करते हैं, यह बात मैंने सुन रखी है ॥ ८ १/२ ॥ अयं हि दुरनुष्ठेयो मोक्षधर्मः सनातनः ॥ ९ ॥ यं हित्वा देवताः सर्वा हव्यकव्यभुजोऽभवन् । किंतु यह सनातन मोक्षधर्म अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है, जिसे छोड़कर सब देवता हव्य और कव्योंके भोक्ता बन गये हैं ॥ ९ १/२ ॥ किं च ब्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्च बलभित् प्रभुः ॥ १० ॥ सूर्यस्ताराधिपो वायुरग्निर्वरुण एव च । आकाशं जगती चैव ये च शेषा दिवौकसः ॥ ११ ॥ प्रलयं न विजानन्ति आत्मनः परिनिर्मितम् । ततस्तेनास्थिता मार्गं ध्रुवमक्षरमव्ययम् ॥ १२ ॥ इसके सिवा ब्रह्मा, रुद्र और बलासुरका वध करनेवाले सामर्थ्यशाली इन्द्र एवं सूर्य, तारापति चन्द्रमा, वायु, अग्नि, वरुण, आकाश, पृथ्वी तथा जो अवशिष्ट देवता बताये गये हैं, वे सब क्या परमात्माके रचे हुए अपने मोक्षमार्गको नहीं जानते हैं? जिससे कि निश्चल, क्षयशून्य एवं अविनाशी मार्गका आश्रय नहीं लेते हैं? ॥ १०—१२ ॥ स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिताः । दोषः कालपरीमाणे महानेष क्रियावताम् ॥ १३ ॥