भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्‌द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना

शौनक उवाच

कथं स भगवान् देवो यज्ञेष्वग्रहरः प्रभुः ।
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित् तथा ॥ १ ॥

शौनकजीने कहा— सूतनन्दन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान् नारायणदेव यज्ञोंमें प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले माने गये हैं तथा वे ही वेदों और वेदांगोंके ज्ञाता परमेश्वर नित्य-निरन्तर यज्ञधारी (यज्ञकर्ता) भी बताये गये हैं। एक ही भगवान्‌में यज्ञोंके कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों कैसे सम्भव होते हैं? ॥ १ ॥

निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षमी भागवतः प्रभुः ।
निवृत्तिधर्मान् विदधे स एव भगवान् प्रभुः ॥ २ ॥

सबके स्वामी क्षमाशील भगवान् नारायण स्वयं तो निवृत्तिधर्ममें ही स्थित हैं और उन्हीं सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ने निवृत्तिधर्मोंका विधान किया है ॥ २ ॥

कथं प्रवृत्तिधर्मेषु भागार्हा देवताः कृताः ।
कथं निवृत्तिधर्माश्च कृता व्यावृत्तबुद्धयः ॥ ३ ॥

इस प्रकार निवृत्तिधर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होंने देवताओंको प्रवृत्तिधर्मोंमें अर्थात् यज्ञादि कर्मोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बनाया? तथा ऋषि-मुनियोंको विषयोंसे विरक्तबुद्धि और निवृत्तिधर्मपरायण किस कारण बनाया? ॥ ३ ॥

एतं नः संशयं सौते छिन्धि गुह्यं सनातनम् ।
त्वया नारायणकथाः श्रुता वै धर्मसंहिताः ॥ ४ ॥

सूतनन्दन! यह गूढ़ संदेह हमारे मनमें सदा उठता रहता है, आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आपने भगवान् नारायणकी बहुत-सी धर्मसंगत कथाएँ सुन रखी हैं ॥ ४ ॥

सौतिरुवाच

जनमेजयेन यत् पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धीमतः ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पौराणं शौनकोत्तम ॥ ५ ॥

सूतपुत्रने कहा— मुनिश्रेष्ठ शौनक! राजा जनमेजयने बुद्धिमान् व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनजीके सम्मुख जो प्रश्न उपस्थित किया था, उस पुराणप्रोक्त विषयका मैं तुम्हारे