भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2292

जनमेजयेन तच्छ्रुत्वा कृतं सम्यग् यथाविधि ।
यूयं हि तप्ततपसः सर्वे च चरितव्रताः ॥ १३९ ॥
**सूतपुत्र बोले—**शौनक! वैशम्पायनजीका कहा हुआ यह सारा आख्यान मैंने तुमसे कहा है। जनमेजयने इसे सुनकर उत्तम विधिपूर्वक भगवान्‌का यजन किया। तुमलोग भी तपस्वी और व्रतका पालन करनेवाले हो ॥ १३८-१३९ ॥
सर्वे वेदविदो मुख्या नैमिषारण्यवासिनः ।
शौनकस्य महासत्रं प्राप्ताः सर्वे द्विजोत्तमाः ॥ १४० ॥
नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले प्रायः सभी ऋषि प्रमुख वेदवेत्ता हैं और सभी श्रेष्ठ द्विज शौनकके इस महायज्ञमें एकत्र हुए हैं ॥ १४० ॥
यजध्वं सुहुतैैर्यज्ञैः शाश्वतं परमेश्वरम् ।
पारम्पर्यागतं ह्येतत् पित्रा मे कथितं पुरा ॥ १४१ ॥
आप सब लोग विधिवत् हवन करके उत्तम यज्ञोंद्वारा उन सनातन परमेश्वरका यजन करें। यह परम्परासे प्राप्त हुआ उत्तम आख्यान मेरे पिताने पहले-पहल मुझसे कहा था ॥ १४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणका माहात्म्यविषयक तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५⅓ श्लोक मिलाकर कुल १५६⅓ श्लोक हैं)