भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2291

राजन्! तुम्हें भी सदा ही भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वे ही सम्पूर्ण जगत्के माता, पिता और गुरु हैं ॥ १३१ १/२ ॥
ब्रह्मण्यदेवो भगवान् प्रीयतां ते सनातनः ॥ १३२ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो महाबुद्धिर्जनार्दनः ।
महाबाहु युधिष्ठिर! ब्राह्मणहितैषी परम बुद्धिमान् सनातन पुरुष भगवान् जनार्दनदेव तुमपर सदा प्रसन्न रहें ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैतदाख्यानवरं धर्मराड् जनमेजय ॥ १३३ ॥
भ्रातरश्चास्य ते सर्वे नारायणपराऽभवन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस उत्तम उपाख्यानको सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर और उनके सभी भाई भगवान् नारायणके परम भक्त हो गये ॥ १३३ १/२ ॥
जितं भगवता तेन पुरुषेणेति भारत ॥ १३४ ॥
नित्यं जप्यपरा भूत्वा सरस्वतीमुदीरयन् ।
भरतनन्दन! वे नित्यप्रति भगवन्नामके जपमें तत्पर होकर 'भगवान् पुरुषोत्तमकी जय हो' ऐसी वाणी बोला करते थे ॥ १३४ १/२ ॥
यो ह्यस्माकं गुरुश्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ १३५ ॥
जगौ परमकं जप्यं नारायणमुदीरयन् ।
जो हमारे परमगुरु मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हैं, वे भी परम उत्तम नारायणमन्त्रका जप करते हुए निरन्तर उनकी महिमाका गान करते रहते हैं ॥ १३५ १/२ ॥
गत्वान्तरिक्षात् सततं क्षीरोदममृताशयम् ॥ १३६ ॥
पूजयित्वा च देवेशं पुनरायात् स्वमाश्रमम् ।
व्यासजी सदा ही आकाशमार्गसे अमृतनिधि क्षीर-सागरके तटपर जाकर देवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् पुनः अपने आश्रमपर लौट आते हैं ॥ १३६ १/२ ॥

भीष्म उवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातं नारदोक्तं मयेरितम् ॥ १३७ ॥
पारम्पर्यागतं ह्येतत् पित्रा मे कथितं पुरा ।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नारदजीका कहा हुआ यह सारा उपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। यह पूर्वपरम्परासे पहले मेरे पिताजीको प्राप्त हुआ। फिर पिताजीने मुझसे कहा था ॥ १३७ १/२ ॥

सौतिरुवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायन कीर्तितम् ॥ १३८ ॥