महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! इस प्रकार यह ऋषिसम्बन्धी आख्यान परम्परासे प्राप्त हुआ है। जो भगवान् वासुदेवका भक्त न हो, उसे किसी तरह भी इसका उपदेश तुम्हें नहीं देना चाहिये ॥ १२५ १/२ ॥
(आख्यानमुत्तमं चेदं श्रावयेद् यः सदा नृप । तदैव मनुजो भक्तः शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ प्राप्नुयादचिराद् राजन् विष्णुलोकं सनातनम् ।) नरेश्वर! जो मनुष्य सदा इस उत्तम उपाख्यानको सुनायेगा, वह भक्त मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर शीघ्र ही भगवान् विष्णुके सनातनलोकको प्राप्त होगा ॥ मत्तोऽन्यानि च ते राजन्नुपाख्यानशतानि वै ॥ १२६ ॥ यानि श्रुतानि सर्वाणि तेषां सारोऽयमुद्धृतः । राजन्! तुमने मुझसे जो अन्य सैकड़ों उपाख्यान सुने हैं, उन सबका यह सारभाग निकालकर तुम्हारे सामने रखा गया है ॥ १२६ १/२ ॥ सुरासुरैर्यथा राजन् निर्मथ्यामृतमुद्धृतम् ॥ १२७ ॥ एवमेतत् पुरा विप्रैः कथामृतमिहोद्धृतम् । युधिष्ठिर! जैसे देवताओं और असुरोंने समुद्रको मथकर उससे अमृत निकाला था, उसी प्रकार प्राचीनकालमें ब्राह्मणोंने सारे शास्त्रोंको मथकर इस अमृतमयी कथाको यहाँ प्रकाशित किया ॥ १२७ १/२ ॥ यश्चेदं पठते नित्यं यश्चेदं शृणुयान्नरः ॥ १२८ ॥ एकान्तभावोपगत एकान्तेषु समाहितः । प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं भूत्वा चन्द्रप्रभो नरः ॥ १२९ ॥ स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः । जो मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ करेगा और जो इसे सदा सुनेगा, वह भगवान्के प्रति अनन्यभावको प्राप्त होकर उनके अनन्य भक्तोंमें एकाग्रचित्तसे अनुरक्त हो श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँच जायगा और वह मनुष्य चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रूप धारण करके उन सहस्रों किरणोंवाले भगवान् नारायणदेवमें प्रवेश करेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२८-१२९ १/२ ॥ मुच्येदार्र्तस्तथा रोगाच्छ्रुत्वेमामादितः कथाम् ॥ १३० ॥ जिज्ञासुर्लभते कामान् भक्तो भक्तगतिं व्रजेत् । इस कथाको आदिसे ही सुनकर रोगी रोगसे मुक्त हो जायगा, जिज्ञासु पुरुषको इच्छानुसार ज्ञान प्राप्त होगा और भक्त पुरुष भक्तजनोचित गतिको प्राप्त होगा ॥ त्वयापि सततं राजन्नभ्यर्च्यः पुरुषोत्तमः ॥ १३१ ॥ स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ।