भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2289

तेभ्यस्तच्छावयामास पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ११८ ॥ ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके अलावा जो दूसरे-दूसरे सिद्धसमुदाय निवास करते हैं, उनके लिये नारदजीने यह वेदतुल्य पुरातन पांचरात्र सुनाया था ॥ ११८ ॥ तेषां सकाशात् सूर्यस्तु श्रुत्वा वै भावितात्मनाम् । आत्मानुगामिनां राजन् श्रावयामास वै ततः ॥ ११९ ॥ षट् षष्टिर्हि सहस्राणि ऋषीणां भावितात्मनाम् । सूर्यस्य तपतो लोकान् निर्मिता ये पुरः सराः ॥ १२० ॥ तेषामकथयत् सूर्यः सर्वेषां भावितात्मनाम् । पवित्र अन्तःकरणवाले उन सिद्धोंके मुखसे भगवान् सूर्यने इस माहात्म्यको सुना। राजन्! सूर्यने सुनकर अपने पीछे चलनेवाले साठ हजार भावितात्मा मुनियोंको इसका श्रवण कराया। लोकमें तपते हुए सूर्यके आगे चलनेके लिये जिन ऋषियोंकी सृष्टि हुई है, उन भावितात्माओंको भी सूर्यदेवने भगवान्‌की यह महिमा सुनायी थी ॥ ११९-१२० १/२ ॥ सूर्यानुगामिभिस्तात ऋषिभिस्तैर्महात्मभिः ॥ १२१ ॥ मेरौ समागता देवाः श्राविताश्चेदमुत्तमम् । तात! सूर्यदेवका अनुसरण करनेवाले उन महात्मा ऋषियोंने मेरुपर्वतपर आये हुए देवताओंको वह उत्तम माहात्म्य सुनाया था ॥ १२१ १/२ ॥ देवानां तु सकाशाद् वै ततः श्रुत्वासितो द्विजः ॥ १२२ ॥ श्रावयामास राजेन्द्र पितॄणां मुनिसत्तमः । राजेन्द्र! मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मण असितने देवताओंके मुखसे उस माहात्म्यको सुनकर पितरोंको सुनाया ॥ १२२ १/२ ॥ (एवं परम्पराख्यातमिदं शान्तनुमाश्रितम् ।) मम चापि पिता तात कथयामास शान्तनुः ॥ १२३ ॥ इस प्रकार परम्परा प्राप्त होकर यह उत्तम ज्ञान महाराज शान्तनुको मिला। तात! फिर पिता शान्तनुने मुझे इसका उपदेश दिया ॥ १२३ ॥ ततो मयापि श्रुत्वा च कीर्तितं तव भारत । सुरैर्वा मुनिभिर्वापि पुराणं यैरिदं श्रुतम् ॥ १२४ ॥ सर्वे ते परमात्मानं पूजयन्ते समन्ततः । भरतनन्दन! पिताजीके मुखसे इस प्रसंगको सुनकर मैंने अब तुमसे इसका वर्णन किया है। देवताओं, मुनियों अथवा जिन लोगोंने भी इस पुरातन ज्ञानको सुना है, वे सभी सब ओर परमात्माका पूजन करते हैं ॥ १२४ १/२ ॥ इदमाख्यानमार्षेयं पारम्पर्यागतं नृप ॥ १२५ ॥ नावासुदेवभक्ताय त्वया देयं कथंचन ।