महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब महातेजस्वी नारदजी भी भगवान्का मनोवाञ्छित अनुग्रह पाकर नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये बदरिकाश्रमकी ओर चल दिये ।। ११० १/२ ।।
इदं महोपनिषदं चतुर्वेदसमन्वितम् ।। १११ ।।
सांख्ययोगकृतं तेन पञ्चरात्रानुशब्दितम् ।
नारायणमुखोद्गीतं नारदोऽश्रावयत् पुनः ।। ११२ ।।
ब्रह्मणः सदने तात यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।
यह महान् उपनिषद् (ज्ञान) चारों वेदोंके विज्ञानसे सम्पन्न है। इसमें सांख्य और योगका सिद्धान्त कूट-कूटकर भरा है। इसकी पांचरात्र आगमके नामसे प्रसिद्धि है। साक्षात् नारायणके मुखसे इसका गान हुआ है। तात! इस विषयको नारदजीने श्वेतद्वीपमें जैसा देखा और सुना था, वैसा ही ब्रह्माजीके भवनमें सुनाया था ।।
युधिष्ठिर उवाच
एतदाश्चर्यभूतं हि माहात्म्यं तस्य धीमतः ।। ११३ ।।
किं वै ब्रह्मा न जानीते यतः शुश्राव नारदात् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! बुद्धिमान् नारायण-देवका माहात्म्य तो बड़ा ही आश्चर्यमय है। क्या ब्रह्माजी इसे नहीं जानते थे कि नारदजीके मुखसे इसका श्रवण किया? ।। ११३ १/२ ।।
पितामहोऽपि भगवांस्तस्माद् देवादनन्तरः ।। ११४ ।।
कथं स न विजानीयात् प्रभावममितौजसः ।
भगवान् ब्रह्मा तो उन्हीं नारायणसे प्रकट हुए हैं। फिर वे उन महातेजस्वी नारायणका प्रभाव कैसे नहीं जानते होंगे? ।। ११४ १/२ ।।
भीष्म उवाच
महाकल्पसहस्राणि महाकल्पशतानि च ।। ११५ ।।
समतीतानि राजेन्द्र सर्गाश्च प्रलयाश्च ह ।
सर्गस्यादौ स्मृतो ब्रह्मा प्रजासर्गकरः प्रभुः ।। ११६ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजेन्द्र! अबतक सैकड़ों और हजारों महाकल्प बीत चुके हैं, कितने ही सर्ग और प्रलय समाप्त हो चुके हैं। सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजी ही प्रजावर्गके सृष्टिकर्ता माने गये हैं ।। ११५-११६ ।।
जानाति देवप्रवरं भूयश्चातोऽधिकं नृप ।
परमात्मानमीशानमात्मनः प्रभवं तथा ।। ११७ ।।
नरेश्वर! वे अपनी उत्पत्तिके कारणभूत देवप्रवर नारायणको इससे भी अधिक जानते हैं। उन्हें सर्वेश्वर और परमात्मा समझते हैं ।। ११७ ।।
ये त्वन्ये ब्रह्मसदने सिद्धसंघाः समागताः ।