भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2287

श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार स्वरूपोंको धारण करनेवाला मैं असंख्य कर्म करके ब्रह्माजीके द्वारा सम्मानित अपने धामको चला जाऊँगा ॥
हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम ॥ १०३ ॥
वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च ।
रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च ॥ १०४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! हंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, दशरथनन्दन राम, यदुवंशी श्रीकृष्ण तथा कल्कि—ये सब मेरे अवतार हैं ॥ १०३-१०४ ॥
यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः ।
सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे ॥ १०५ ॥
जब-जब वेद-श्रुति लुप्त हुई है, तब-तब अवतार लेकर मैंने पुनः उसे प्रकाशमें ला दिया है। मैंने ही पहले सत्ययुगमें वेदोंसहित श्रुतियोंको प्रकट किया था ॥ १०५ ॥
अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् ।
अतिक्रान्ताश्च बहवः प्रादुर्भावा ममोत्तमाः ॥ १०६ ॥
मेरे जो अवतार अबतक व्यतीत हो चुके हैं, उन्हें सम्भवतः तुमने पुराणोंमें सुना होगा। मेरे कई उत्तमोत्तम अवतार हो चुके हैं ॥ १०६ ॥
लोककार्याणि कृत्वा च पुनः स्वां प्रकृतिं गताः ।
न ह्येतद् ब्रह्मणा प्राप्तमीदृशं मम दर्शनम् ॥ १०७ ॥
यत् त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना ।
वे अवतार लोकहितके कार्य सम्पन्न करके पुनः अपने मूलस्वरूपमें मिल गये हैं। मुझमें अनन्य भक्ति रखनेके कारण आज तुमने यहाँ जिस स्वरूपका दर्शन पाया है, मेरे ऐसे स्वरूपका दर्शन अबतक ब्रह्माको भी नहीं प्राप्त हो सका है ॥ १०७ १/२ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं ब्रह्मन् भक्तिमतो मया ॥ १०८ ॥
पुराणं च भविष्यं च सरहस्यं च सत्तम ।
ब्रह्मन्! साधुप्रवर! तुम मुझमें भक्तिभाव रखनेवाले हो, इसलिये मैंने तुमसे भूत और भविष्यके सारे अवतारोंका रहस्यसहित वर्णन किया है ॥ १०८ १/२ ॥

भीष्म उवाच

एवं स भगवान् देवो विश्वमूर्तिधरोऽव्ययः ॥ १०९ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तर्दधे पुनः ।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! विश्वरूपधारी अविनाशी भगवान् नारायणदेव इतनी बात कहकर वहीं पुनः अन्तर्धान हो गये ॥ १०९ १/२ ॥
नारदोऽपि महातेजाः प्राप्यानुग्रहमीप्सितम् ॥ ११० ॥
नरनारायणौ द्रष्टुं बदर्याश्रममाद्रवत् ।