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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार स्वरूपोंको धारण करनेवाला मैं असंख्य कर्म करके ब्रह्माजीके द्वारा सम्मानित अपने धामको चला जाऊँगा ॥
हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम ॥ १०३ ॥
वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च ।
रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च ॥ १०४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! हंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, दशरथनन्दन राम, यदुवंशी श्रीकृष्ण तथा कल्कि—ये सब मेरे अवतार हैं ॥ १०३-१०४ ॥
यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः ।
सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे ॥ १०५ ॥
जब-जब वेद-श्रुति लुप्त हुई है, तब-तब अवतार लेकर मैंने पुनः उसे प्रकाशमें ला दिया है। मैंने ही पहले सत्ययुगमें वेदोंसहित श्रुतियोंको प्रकट किया था ॥ १०५ ॥
अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् ।
अतिक्रान्ताश्च बहवः प्रादुर्भावा ममोत्तमाः ॥ १०६ ॥
मेरे जो अवतार अबतक व्यतीत हो चुके हैं, उन्हें सम्भवतः तुमने पुराणोंमें सुना होगा। मेरे कई उत्तमोत्तम अवतार हो चुके हैं ॥ १०६ ॥
लोककार्याणि कृत्वा च पुनः स्वां प्रकृतिं गताः ।
न ह्येतद् ब्रह्मणा प्राप्तमीदृशं मम दर्शनम् ॥ १०७ ॥
यत् त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना ।
वे अवतार लोकहितके कार्य सम्पन्न करके पुनः अपने मूलस्वरूपमें मिल गये हैं। मुझमें अनन्य भक्ति रखनेके कारण आज तुमने यहाँ जिस स्वरूपका दर्शन पाया है, मेरे ऐसे स्वरूपका दर्शन अबतक ब्रह्माको भी नहीं प्राप्त हो सका है ॥ १०७ १/२ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं ब्रह्मन् भक्तिमतो मया ॥ १०८ ॥
पुराणं च भविष्यं च सरहस्यं च सत्तम ।
ब्रह्मन्! साधुप्रवर! तुम मुझमें भक्तिभाव रखनेवाले हो, इसलिये मैंने तुमसे भूत और भविष्यके सारे अवतारोंका रहस्यसहित वर्णन किया है ॥ १०८ १/२ ॥

भीष्म उवाच

एवं स भगवान् देवो विश्वमूर्तिधरोऽव्ययः ॥ १०९ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तर्दधे पुनः ।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! विश्वरूपधारी अविनाशी भगवान् नारायणदेव इतनी बात कहकर वहीं पुनः अन्तर्धान हो गये ॥ १०९ १/२ ॥
नारदोऽपि महातेजाः प्राप्यानुग्रहमीप्सितम् ॥ ११० ॥
नरनारायणौ द्रष्टुं बदर्याश्रममाद्रवत् ।

तब महातेजस्वी नारदजी भी भगवान्‌का मनोवाञ्छित अनुग्रह पाकर नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये बदरिकाश्रमकी ओर चल दिये ।। ११० १/२ ।।
इदं महोपनिषदं चतुर्वेदसमन्वितम् ।। १११ ।।
सांख्ययोगकृतं तेन पञ्चरात्रानुशब्दितम् ।
नारायणमुखोद्गीतं नारदोऽश्रावयत् पुनः ।। ११२ ।।
ब्रह्मणः सदने तात यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।
यह महान् उपनिषद् (ज्ञान) चारों वेदोंके विज्ञानसे सम्पन्न है। इसमें सांख्य और योगका सिद्धान्त कूट-कूटकर भरा है। इसकी पांचरात्र आगमके नामसे प्रसिद्धि है। साक्षात् नारायणके मुखसे इसका गान हुआ है। तात! इस विषयको नारदजीने श्वेतद्वीपमें जैसा देखा और सुना था, वैसा ही ब्रह्माजीके भवनमें सुनाया था ।।

युधिष्ठिर उवाच
एतदाश्चर्यभूतं हि माहात्म्यं तस्य धीमतः ।। ११३ ।।
किं वै ब्रह्मा न जानीते यतः शुश्राव नारदात् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! बुद्धिमान् नारायण-देवका माहात्म्य तो बड़ा ही आश्चर्यमय है। क्या ब्रह्माजी इसे नहीं जानते थे कि नारदजीके मुखसे इसका श्रवण किया? ।। ११३ १/२ ।।
पितामहोऽपि भगवांस्तस्माद् देवादनन्तरः ।। ११४ ।।
कथं स न विजानीयात् प्रभावममितौजसः ।
भगवान् ब्रह्मा तो उन्हीं नारायणसे प्रकट हुए हैं। फिर वे उन महातेजस्वी नारायणका प्रभाव कैसे नहीं जानते होंगे? ।। ११४ १/२ ।।

भीष्म उवाच
महाकल्पसहस्राणि महाकल्पशतानि च ।। ११५ ।।
समतीतानि राजेन्द्र सर्गाश्च प्रलयाश्च ह ।
सर्गस्यादौ स्मृतो ब्रह्मा प्रजासर्गकरः प्रभुः ।। ११६ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजेन्द्र! अबतक सैकड़ों और हजारों महाकल्प बीत चुके हैं, कितने ही सर्ग और प्रलय समाप्त हो चुके हैं। सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजी ही प्रजावर्गके सृष्टिकर्ता माने गये हैं ।। ११५-११६ ।।
जानाति देवप्रवरं भूयश्चातोऽधिकं नृप ।
परमात्मानमीशानमात्मनः प्रभवं तथा ।। ११७ ।।
नरेश्वर! वे अपनी उत्पत्तिके कारणभूत देवप्रवर नारायणको इससे भी अधिक जानते हैं। उन्हें सर्वेश्वर और परमात्मा समझते हैं ।। ११७ ।।
ये त्वन्ये ब्रह्मसदने सिद्धसंघाः समागताः ।

तेभ्यस्तच्छावयामास पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ११८ ॥ ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके अलावा जो दूसरे-दूसरे सिद्धसमुदाय निवास करते हैं, उनके लिये नारदजीने यह वेदतुल्य पुरातन पांचरात्र सुनाया था ॥ ११८ ॥ तेषां सकाशात् सूर्यस्तु श्रुत्वा वै भावितात्मनाम् । आत्मानुगामिनां राजन् श्रावयामास वै ततः ॥ ११९ ॥ षट् षष्टिर्हि सहस्राणि ऋषीणां भावितात्मनाम् । सूर्यस्य तपतो लोकान् निर्मिता ये पुरः सराः ॥ १२० ॥ तेषामकथयत् सूर्यः सर्वेषां भावितात्मनाम् । पवित्र अन्तःकरणवाले उन सिद्धोंके मुखसे भगवान् सूर्यने इस माहात्म्यको सुना। राजन्! सूर्यने सुनकर अपने पीछे चलनेवाले साठ हजार भावितात्मा मुनियोंको इसका श्रवण कराया। लोकमें तपते हुए सूर्यके आगे चलनेके लिये जिन ऋषियोंकी सृष्टि हुई है, उन भावितात्माओंको भी सूर्यदेवने भगवान्‌की यह महिमा सुनायी थी ॥ ११९-१२० १/२ ॥ सूर्यानुगामिभिस्तात ऋषिभिस्तैर्महात्मभिः ॥ १२१ ॥ मेरौ समागता देवाः श्राविताश्चेदमुत्तमम् । तात! सूर्यदेवका अनुसरण करनेवाले उन महात्मा ऋषियोंने मेरुपर्वतपर आये हुए देवताओंको वह उत्तम माहात्म्य सुनाया था ॥ १२१ १/२ ॥ देवानां तु सकाशाद् वै ततः श्रुत्वासितो द्विजः ॥ १२२ ॥ श्रावयामास राजेन्द्र पितॄणां मुनिसत्तमः । राजेन्द्र! मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मण असितने देवताओंके मुखसे उस माहात्म्यको सुनकर पितरोंको सुनाया ॥ १२२ १/२ ॥ (एवं परम्पराख्यातमिदं शान्तनुमाश्रितम् ।) मम चापि पिता तात कथयामास शान्तनुः ॥ १२३ ॥ इस प्रकार परम्परा प्राप्त होकर यह उत्तम ज्ञान महाराज शान्तनुको मिला। तात! फिर पिता शान्तनुने मुझे इसका उपदेश दिया ॥ १२३ ॥ ततो मयापि श्रुत्वा च कीर्तितं तव भारत । सुरैर्वा मुनिभिर्वापि पुराणं यैरिदं श्रुतम् ॥ १२४ ॥ सर्वे ते परमात्मानं पूजयन्ते समन्ततः । भरतनन्दन! पिताजीके मुखसे इस प्रसंगको सुनकर मैंने अब तुमसे इसका वर्णन किया है। देवताओं, मुनियों अथवा जिन लोगोंने भी इस पुरातन ज्ञानको सुना है, वे सभी सब ओर परमात्माका पूजन करते हैं ॥ १२४ १/२ ॥ इदमाख्यानमार्षेयं पारम्पर्यागतं नृप ॥ १२५ ॥ नावासुदेवभक्ताय त्वया देयं कथंचन ।

नरेश्वर! इस प्रकार यह ऋषिसम्बन्धी आख्यान परम्परासे प्राप्त हुआ है। जो भगवान् वासुदेवका भक्त न हो, उसे किसी तरह भी इसका उपदेश तुम्हें नहीं देना चाहिये ॥ १२५ १/२ ॥

(आख्यानमुत्तमं चेदं श्रावयेद् यः सदा नृप । तदैव मनुजो भक्तः शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ प्राप्नुयादचिराद् राजन् विष्णुलोकं सनातनम् ।) नरेश्वर! जो मनुष्य सदा इस उत्तम उपाख्यानको सुनायेगा, वह भक्त मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर शीघ्र ही भगवान् विष्णुके सनातनलोकको प्राप्त होगा ॥ मत्तोऽन्यानि च ते राजन्नुपाख्यानशतानि वै ॥ १२६ ॥ यानि श्रुतानि सर्वाणि तेषां सारोऽयमुद्धृतः । राजन्! तुमने मुझसे जो अन्य सैकड़ों उपाख्यान सुने हैं, उन सबका यह सारभाग निकालकर तुम्हारे सामने रखा गया है ॥ १२६ १/२ ॥ सुरासुरैर्यथा राजन् निर्मथ्यामृतमुद्धृतम् ॥ १२७ ॥ एवमेतत् पुरा विप्रैः कथामृतमिहोद्धृतम् । युधिष्ठिर! जैसे देवताओं और असुरोंने समुद्रको मथकर उससे अमृत निकाला था, उसी प्रकार प्राचीनकालमें ब्राह्मणोंने सारे शास्त्रोंको मथकर इस अमृतमयी कथाको यहाँ प्रकाशित किया ॥ १२७ १/२ ॥ यश्चेदं पठते नित्यं यश्चेदं शृणुयान्नरः ॥ १२८ ॥ एकान्तभावोपगत एकान्तेषु समाहितः । प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं भूत्वा चन्द्रप्रभो नरः ॥ १२९ ॥ स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः । जो मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ करेगा और जो इसे सदा सुनेगा, वह भगवान्‌के प्रति अनन्यभावको प्राप्त होकर उनके अनन्य भक्तोंमें एकाग्रचित्तसे अनुरक्त हो श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँच जायगा और वह मनुष्य चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रूप धारण करके उन सहस्रों किरणोंवाले भगवान् नारायणदेवमें प्रवेश करेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२८-१२९ १/२ ॥ मुच्येदार्र्तस्तथा रोगाच्छ्रुत्वेमामादितः कथाम् ॥ १३० ॥ जिज्ञासुर्लभते कामान् भक्तो भक्तगतिं व्रजेत् । इस कथाको आदिसे ही सुनकर रोगी रोगसे मुक्त हो जायगा, जिज्ञासु पुरुषको इच्छानुसार ज्ञान प्राप्त होगा और भक्त पुरुष भक्तजनोचित गतिको प्राप्त होगा ॥ त्वयापि सततं राजन्नभ्यर्च्यः पुरुषोत्तमः ॥ १३१ ॥ स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ।

राजन्! तुम्हें भी सदा ही भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वे ही सम्पूर्ण जगत्के माता, पिता और गुरु हैं ॥ १३१ १/२ ॥
ब्रह्मण्यदेवो भगवान् प्रीयतां ते सनातनः ॥ १३२ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो महाबुद्धिर्जनार्दनः ।
महाबाहु युधिष्ठिर! ब्राह्मणहितैषी परम बुद्धिमान् सनातन पुरुष भगवान् जनार्दनदेव तुमपर सदा प्रसन्न रहें ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैतदाख्यानवरं धर्मराड् जनमेजय ॥ १३३ ॥
भ्रातरश्चास्य ते सर्वे नारायणपराऽभवन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस उत्तम उपाख्यानको सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर और उनके सभी भाई भगवान् नारायणके परम भक्त हो गये ॥ १३३ १/२ ॥
जितं भगवता तेन पुरुषेणेति भारत ॥ १३४ ॥
नित्यं जप्यपरा भूत्वा सरस्वतीमुदीरयन् ।
भरतनन्दन! वे नित्यप्रति भगवन्नामके जपमें तत्पर होकर 'भगवान् पुरुषोत्तमकी जय हो' ऐसी वाणी बोला करते थे ॥ १३४ १/२ ॥
यो ह्यस्माकं गुरुश्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ १३५ ॥
जगौ परमकं जप्यं नारायणमुदीरयन् ।
जो हमारे परमगुरु मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हैं, वे भी परम उत्तम नारायणमन्त्रका जप करते हुए निरन्तर उनकी महिमाका गान करते रहते हैं ॥ १३५ १/२ ॥
गत्वान्तरिक्षात् सततं क्षीरोदममृताशयम् ॥ १३६ ॥
पूजयित्वा च देवेशं पुनरायात् स्वमाश्रमम् ।
व्यासजी सदा ही आकाशमार्गसे अमृतनिधि क्षीर-सागरके तटपर जाकर देवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् पुनः अपने आश्रमपर लौट आते हैं ॥ १३६ १/२ ॥

भीष्म उवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातं नारदोक्तं मयेरितम् ॥ १३७ ॥
पारम्पर्यागतं ह्येतत् पित्रा मे कथितं पुरा ।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नारदजीका कहा हुआ यह सारा उपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। यह पूर्वपरम्परासे पहले मेरे पिताजीको प्राप्त हुआ। फिर पिताजीने मुझसे कहा था ॥ १३७ १/२ ॥

सौतिरुवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायन कीर्तितम् ॥ १३८ ॥

जनमेजयेन तच्छ्रुत्वा कृतं सम्यग् यथाविधि ।
यूयं हि तप्ततपसः सर्वे च चरितव्रताः ॥ १३९ ॥
**सूतपुत्र बोले—**शौनक! वैशम्पायनजीका कहा हुआ यह सारा आख्यान मैंने तुमसे कहा है। जनमेजयने इसे सुनकर उत्तम विधिपूर्वक भगवान्‌का यजन किया। तुमलोग भी तपस्वी और व्रतका पालन करनेवाले हो ॥ १३८-१३९ ॥
सर्वे वेदविदो मुख्या नैमिषारण्यवासिनः ।
शौनकस्य महासत्रं प्राप्ताः सर्वे द्विजोत्तमाः ॥ १४० ॥
नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले प्रायः सभी ऋषि प्रमुख वेदवेत्ता हैं और सभी श्रेष्ठ द्विज शौनकके इस महायज्ञमें एकत्र हुए हैं ॥ १४० ॥
यजध्वं सुहुतैैर्यज्ञैः शाश्वतं परमेश्वरम् ।
पारम्पर्यागतं ह्येतत् पित्रा मे कथितं पुरा ॥ १४१ ॥
आप सब लोग विधिवत् हवन करके उत्तम यज्ञोंद्वारा उन सनातन परमेश्वरका यजन करें। यह परम्परासे प्राप्त हुआ उत्तम आख्यान मेरे पिताने पहले-पहल मुझसे कहा था ॥ १४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणका माहात्म्यविषयक तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५⅓ श्लोक मिलाकर कुल १५६⅓ श्लोक हैं)

व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्‌द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना

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चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्‌द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना

शौनक उवाच

कथं स भगवान् देवो यज्ञेष्वग्रहरः प्रभुः ।
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित् तथा ॥ १ ॥

शौनकजीने कहा— सूतनन्दन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान् नारायणदेव यज्ञोंमें प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले माने गये हैं तथा वे ही वेदों और वेदांगोंके ज्ञाता परमेश्वर नित्य-निरन्तर यज्ञधारी (यज्ञकर्ता) भी बताये गये हैं। एक ही भगवान्‌में यज्ञोंके कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों कैसे सम्भव होते हैं? ॥ १ ॥

निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षमी भागवतः प्रभुः ।
निवृत्तिधर्मान् विदधे स एव भगवान् प्रभुः ॥ २ ॥

सबके स्वामी क्षमाशील भगवान् नारायण स्वयं तो निवृत्तिधर्ममें ही स्थित हैं और उन्हीं सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ने निवृत्तिधर्मोंका विधान किया है ॥ २ ॥

कथं प्रवृत्तिधर्मेषु भागार्हा देवताः कृताः ।
कथं निवृत्तिधर्माश्च कृता व्यावृत्तबुद्धयः ॥ ३ ॥

इस प्रकार निवृत्तिधर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होंने देवताओंको प्रवृत्तिधर्मोंमें अर्थात् यज्ञादि कर्मोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बनाया? तथा ऋषि-मुनियोंको विषयोंसे विरक्तबुद्धि और निवृत्तिधर्मपरायण किस कारण बनाया? ॥ ३ ॥

एतं नः संशयं सौते छिन्धि गुह्यं सनातनम् ।
त्वया नारायणकथाः श्रुता वै धर्मसंहिताः ॥ ४ ॥

सूतनन्दन! यह गूढ़ संदेह हमारे मनमें सदा उठता रहता है, आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आपने भगवान् नारायणकी बहुत-सी धर्मसंगत कथाएँ सुन रखी हैं ॥ ४ ॥

सौतिरुवाच

जनमेजयेन यत् पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धीमतः ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पौराणं शौनकोत्तम ॥ ५ ॥

सूतपुत्रने कहा— मुनिश्रेष्ठ शौनक! राजा जनमेजयने बुद्धिमान् व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनजीके सम्मुख जो प्रश्न उपस्थित किया था, उस पुराणप्रोक्त विषयका मैं तुम्हारे

सामने वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥ श्रुत्वा माहात्म्यमेतस्य देहिनां परमात्मनः । जनमेजयो महाप्राज्ञो वैशम्पायनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ परम बुद्धिमान् जनमेजयने समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप इन परमात्मा नारायणदेवका माहात्म्य सुनकर उनसे इस प्रकार कहा ॥ ६ ॥ जनमेजय उवाच इमे सब्रह्मका लोकाः ससुरासुरमानवाः । क्रियास्वभ्युदयोक्तासु सक्ता दृश्यन्ति सर्वशः ॥ ७ ॥ जनमेजय बोले—मुने! ब्रह्मा, देवगण, असुरगण तथा मनुष्योंसहित ये समस्त लोक लौकिक अभ्युदयके लिये बताये गये कर्मोंमें ही आसक्त देखे जाते हैं ॥ ७ ॥ मोक्षश्चोक्तस्त्वया ब्रह्मन् निर्वाणं परमं सुखम् । ये तु मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिताः ॥ ८ ॥ ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्तीह शुश्रुम । ब्रह्मन्! परंतु आपने मोक्षको परम शान्ति एवं परम सुखस्वरूप बताया है। जो मुक्त होते हैं, वे पुण्य और पापसे रहित हो सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले भगवान् नारायणदेवमें प्रवेश करते हैं, यह बात मैंने सुन रखी है ॥ ८ १/२ ॥ अयं हि दुरनुष्ठेयो मोक्षधर्मः सनातनः ॥ ९ ॥ यं हित्वा देवताः सर्वा हव्यकव्यभुजोऽभवन् । किंतु यह सनातन मोक्षधर्म अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है, जिसे छोड़कर सब देवता हव्य और कव्योंके भोक्ता बन गये हैं ॥ ९ १/२ ॥ किं च ब्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्च बलभित् प्रभुः ॥ १० ॥ सूर्यस्ताराधिपो वायुरग्निर्वरुण एव च । आकाशं जगती चैव ये च शेषा दिवौकसः ॥ ११ ॥ प्रलयं न विजानन्ति आत्मनः परिनिर्मितम् । ततस्तेनास्थिता मार्गं ध्रुवमक्षरमव्ययम् ॥ १२ ॥ इसके सिवा ब्रह्मा, रुद्र और बलासुरका वध करनेवाले सामर्थ्यशाली इन्द्र एवं सूर्य, तारापति चन्द्रमा, वायु, अग्नि, वरुण, आकाश, पृथ्वी तथा जो अवशिष्ट देवता बताये गये हैं, वे सब क्या परमात्माके रचे हुए अपने मोक्षमार्गको नहीं जानते हैं? जिससे कि निश्चल, क्षयशून्य एवं अविनाशी मार्गका आश्रय नहीं लेते हैं? ॥ १०—१२ ॥ स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिताः । दोषः कालपरीमाणे महानेष क्रियावताम् ॥ १३ ॥

जो लोग नियत कालतक प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलोंको लक्ष्य करके प्रवृत्तिमार्गका आश्रय लेते हैं, उन कर्मपरायण पुरुषोंके लिये यही सबसे बड़ा दोष है कि वे कालकी सीमामें आबद्ध रहकर ही कर्मका फल भोग करते हैं ॥ १३ ॥ एतन्मे संशयं विप्र हृदि शल्यमिवार्पितम् । छिन्धीतिहासकथनात् परं कौतूहलं हि मे ॥ १४ ॥ विप्रवर! यह संशय मेरे हृदयमें काँटेके समान चुभता है। आप इतिहास सुनाकर मेरे संदेहका निवारण करें। मेरे मनमें इस विषयको जाननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ १४ ॥ कथं भागहराः प्रोक्ता देवताः क्रतुषु द्विज । किमर्थं चाध्वरे ब्रह्मन्निज्यन्ते त्रिदिवौकसः ॥ १५ ॥ द्विजश्रेष्ठ! देवताओंको यज्ञोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बताया गया है? ब्रह्मन्! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवताओंकी ही यज्ञमें किसलिये पूजा की जाती है? ॥ १५ ॥ ये च भागं प्रगृह्णन्ति यज्ञेषु द्विजसत्तम । ते यजन्तो महायज्ञैः कस्य भागं ददन्ति वै ॥ १६ ॥ ब्राह्मणशिरोमणे! जो यज्ञोंमें भाग ग्रहण करते हैं, वे देवता जब स्वयं महायज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, तब किसको भाग समर्पित करते हैं? ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

अहो गूढतमः प्रश्नस्त्वया पृष्टो जनेश्वर । नातप्ततपसा ह्येष नावेदविदुषा तथा ॥ १७ ॥ नापुराणविदा चैव शक्यो व्याहर्तुमञ्जसा । **वैशम्पायनजीने कहा—**जनेश्वर! तुमने बड़ा गूढ़ प्रश्न उपस्थित किया है। जिसने तपस्या नहीं की है तथा जो वेदों और पुराणोंका विद्वान् नहीं है, वह मनुष्य अनायास ही ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ १७१/२ ॥ हन्त ते कथयिष्यामि यन्मे पृष्टः पुरा गुरुः ॥ १८ ॥ कृष्णद्वैपायनो व्यासो वेदव्यासो महार्षिः । अब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। पूर्वकालमें मेरे पूछनेपर वेदोंका विस्तार करनेवाले गुरुदेव महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने जो कुछ बताया था, वही मैं तुमसे कहूँगा ॥ १८१/२ ॥ सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः ॥ १९ ॥ अहं चतुर्थः शिष्यो वै पञ्चमश्च शुकः स्मृतः ।

सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पैल—इन तीनके सिवा व्यासजीका चौथा शिष्य मैं ही हूँ और पाँचवें शिष्य उनके पुत्र शुकदेव माने गये हैं॥ १९ ½ ॥

एतान् समागतान् सर्वान् पञ्च शिष्यान् दमान्वितान् ॥ २० ॥ शौचाचारसमायुक्तान् जितक्रोधान् जितेन्द्रियान् । वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ॥ २१ ॥ ये पाँचों शिष्य इन्द्रियदमन एवं मनोनिग्रहसे सम्पन्न, शौच तथा सदाचारसे संयुक्त, क्रोधशून्य और जितेन्द्रिय हैं। अपनी सेवामें आये हुए इन सभी शिष्योंको व्यासजीने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन कराया॥

मेरौ गिरिवरे रम्ये सिद्धचारणसेविते । तेषामभ्यस्यतां वेदान् कदाचित् संशयोऽभवत् ॥ २२ ॥ एष वै यस्त्वया पृष्टस्तेन तेषां प्रकीर्तितः । ततः श्रुतो मया चापि तवाख्येयोऽद्य भारत ॥ २३ ॥ सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिवर मेरुके रमणीय शिखरपर वेदाभ्यास करते हुए हम सब शिष्योंके मनमें किसी समय यही संदेह उत्पन्न हुआ, जिसे आज तुमने पूछा है। भारत! व्यासजीने हम शिष्योंको जो उत्तर दिया, उसे मैंने भी उन्हींके मुखसे सुना था। वही आज तुम्हें भी बताना है॥ २२-२३॥

शिष्याणां वचनं श्रुत्वा सर्वाज्ञानतमोनुदः । पराशरसुतः श्रीमान् व्यासो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥ अपने शिष्योंका संशययुक्त वचन सुनकर सबके अज्ञानान्धकारका निवारण करनेवाले पराशरनन्दन श्रीमान् व्यासजीने यह बात कही—॥ २४॥

मया हि सुमहत् तप्तं तपः परमदारुणम् । भूतं भव्यं भविष्यं च जानीयामिति सत्तमाः ॥ २५ ॥ ‘साधु पुरुषोंमें श्रेष्ठ शिष्यगण! एक समयकी बात है कि मैंने भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त कठोर और बड़ी भारी तपस्या की॥ २५॥

तस्य मे तप्ततपसो निगृहीतेन्द्रियस्य च । नारायणप्रसादेन क्षीरोदस्यानुकूलतः ॥ २६ ॥ त्रैकालिकमिदं ज्ञानं प्रादुर्भूतं यथेप्सितम् । तच्छृणुध्वं यथान्यायं वक्ष्ये संशयमुत्तमम् ॥ २७ ॥ ‘जब मैं इन्द्रियोंको वशमें करके अपनी तपस्या पूर्ण कर चुका, तब भगवान् नारायणके कृपाप्रसादसे क्षीरसागरके तटपर मुझे मेरी इच्छाके अनुसार यह तीनों कालोंका ज्ञान प्राप्त

हुआ। अतः मैं तुम्हारे संदेहके निवारणके लिये उत्तम एवं न्यायोचित बात कहूँगा। तुमलोग ध्यान देकर सुनो ।। २६-२७ ।।

यथा वृत्तं हि कल्पादौ दृष्टं मे ज्ञानचक्षुषा । परमात्मेति यं प्राहुः सांख्ययोगविदो जनाः ।। २८ ।। महापुरुषसंज्ञां स लभते स्वेन कर्मणा । तस्मात् प्रसूतम्व्यक्तं प्रधानं तं विदुर्बुधाः ।। २९ ।। 'कल्पके आदिमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था और जिसे मैंने ज्ञानदृष्टिसे देखा था, वह सब बता रहा हूँ। सांख्य और योगके विद्वान् जिन्हें परमात्मा कहते हैं, वे ही अपने कर्मके प्रभावसे महापुरुष नाम धारण करते हैं। उन्हींसे अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई है, जिसे विद्वान् पुरुष प्रधानके नामसे भी जानते हैं ।। २८-२९ ।।

अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् । अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मेति कथ्यते ।। ३० ।। 'जगत्की सृष्टिके लिये उन्हीं महापुरुष और अव्यक्तसे व्यक्तकी उत्पत्ति हुई, जिसे सम्पूर्ण लोकोंमें अनिरुद्ध एवं महान् आत्मा कहते हैं ।। ३० ।।

योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ।। ३१ ।। 'व्यक्तभावको प्राप्त हुए उन्हीं अनिरुद्धने पितामह ब्रह्माकी सृष्टि की। वे ब्रह्मा सम्पूर्ण तेजोमय हैं और उन्हींको समष्टि अहंकार कहा गया है ।। ३१ ।।

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । अहंकार प्रसूतानि महाभूतानि पञ्चधा ।। ३२ ।। 'पृथ्‍वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये पाँच सूक्ष्म महाभूत अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं ।। ३२ ।।

महाभूतानि सृष्ट्वैव तान् गुणान् निर्ममे पुनः । भूतेभ्यश्चैव निष्पन्ना मूर्तिमन्तश्च तान् शृणु ।। ३३ ।। 'अहंकारस्वरूप ब्रह्माने पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टि करके फिर उनके शब्द-स्पर्श आदि गुणोंका निर्माण किया। उन भूतोंसे जो मूर्तिमान् प्राणी उत्पन्न हुए, उनके नाम सुनो ।। ३३ ।।

मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महात्मा वै मनुः स्वायम्भुवस्तथा ।। ३४ ।। 'मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, महात्मा वसिष्ठ और स्वायम्भुव मनु ।। ३४ ।।

ज्ञेयाः प्रकृतयोऽष्टौ ता यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः । वेदवेदाङ्गसंयुक्तान् यज्ञान् यज्ञाङ्गसंयुतान् ।। ३५ ।।

निर्ममे लोकसिद्धयर्थं ब्रह्मा लोकपितामहः ।
अष्टाभ्यः प्रकृतिभ्यश्च जातं विश्वमिदं जगत् ॥ ३६ ॥
‘इन आठोंको प्रकृति जानना चाहिये, जिनमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। लोकपितामह ब्रह्माने सम्पूर्ण लोकोंके जीवन-निर्वाहके लिये वेद-वेदांग और यज्ञांगोंसे युक्त यज्ञोंकी सृष्टि की है। पूर्वोक्त आठ प्रकृतियोंसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है ॥ ३५-३६ ॥
रुद्रो रोषात्मको जातो दशान्यान् सोऽसृजत् स्वयम् ।
एकादशैते रुद्रास्तु विकारपुरुषाः स्मृताः ॥ ३७ ॥
‘ब्रह्माजीके रोषसे रुद्रका प्रादुर्भाव हुआ है। उन रुद्रने स्वयं ही दस अन्य रुद्रोंकी भी सृष्टि कर ली है। इस प्रकार ये ग्यारह रुद्र हैं, जो विकारपुरुष माने गये हैं ॥ ३७ ॥
ते रुद्राः प्रकृतिश्चैव सर्वे चैव सुरर्षयः ।
उत्पन्ना लोकसिद्धयर्थं ब्रह्माणं समुपस्थिताः ॥ ३८ ॥
‘वे ग्यारह रुद्र, आठ प्रकृति और समस्त देवर्षिगण, जो लोकरक्षाके लिये उत्पन्न हुए थे, ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ३८ ॥
वयं सृष्टा हि भगवंस्त्वया च प्रभविष्णुना ।
येन यस्मिन्नधीकारे वर्तितव्यं पितामह ॥ ३९ ॥
योऽसौ त्वयाभिनिर्दिष्टो ह्यधिकारोऽर्थचिन्तकः ।
परिपाल्यः कथं तेन साहंकारेण कर्तृणा ॥ ४० ॥
(और इस प्रकार बोले—) ‘भगवन्! पितामह! आप महान् प्रभावशाली हैं। आपने ही हमलोगोंकी सृष्टि की है। हममेंसे जिसको जिस अधिकार या कार्यमें प्रवृत्त होना है तथा आपके द्वारा जिस अर्थसाधक अधिकारका निर्देश किया गया है, उसका पालन अहंकारयुक्त कर्ताके द्वारा कैसे हो सकता है? ॥ ३९-४० ॥
प्रदिशस्व बलं तस्य योऽधिकारार्थचिन्तकः ।
एवमुक्तो महादेवो देवांस्तानिदमब्रवीत् ॥ ४१ ॥
‘उस अधिकार और प्रयोजनका चिन्तन करनेवाला जो पुरुष है, उसे आप कर्तव्यपालनकी शक्ति प्रदान कीजिये।’ उनके ऐसा कहनेपर महान् देव ब्रह्माजीने उन देवताओंसे इस प्रकार कहा ॥ ४१ ॥

ब्रह्मोवाच
साध्वहं ज्ञापितो देवा युष्माभिर्भद्रमस्तु वः ।
ममाप्येषा समुत्पन्ना चिन्ता या भवतां मता ॥ ४२ ॥
ब्रह्माजी बोले—देवताओ! तुमने मुझे अच्छी बात सुझायी है! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे हृदयमें जो चिन्ता उत्पन्न हुई है, वही मेरे हृदयमें भी पैदा हुई है ॥
लोकत्रयस्य कृत्स्नस्य कथं कार्यः परिग्रहः ।

कथं बलक्षयो न स्याद् युष्माकं ह्यात्मनश्च मे ॥ ४३ ॥
किस प्रकार तीनों लोकोंके अधिकृत कार्यका सम्पादन किया जाय तथा किस तरह तुम्हारी और मेरी शक्तिका भी क्षय न हो ॥ ४३ ॥
इतः सर्वेऽपि गच्छामः शरणं लोकसाक्षिणम् ।
महापुरुषमव्यक्तं स नो वक्ष्यति यद्धितम् ॥ ४४ ॥
हम सब लोग यहाँसे अव्यक्त लोकसाक्षी महापुरुष नारायणदेवकी शरणमें चलें। वे हमारे लिये हितकी बात बतायेंगे ॥ ४४ ॥
ततस्ते ब्रह्मणा सार्धमृषयो विबुधास्तथा ।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जग्मुर्लोकहितार्थिनः ॥ ४५ ॥
तदनन्तर वे सब ऋषि और देवता सम्पूर्ण जगत्के हितकी भावना लेकर ब्रह्माजीके साथ क्षीरसागरके उत्तर तटपर गये ॥ ४५ ॥
ते तपः समुपातिष्ठन् ब्रह्मोक्तं वेदकल्पितम् ।
स महानियमो नाम तपश्चर्यासु दारुणः ॥ ४६ ॥
वहाँ ब्रह्माजीके कथनानुसार उन सबने वेदोक्त रीतिसे तपस्या आरम्भ की। उनका वह महान् नियम सभी तपस्याओंमें कठोर था ॥ ४६ ॥
ऊर्ध्वा दृष्टिर्बाहवश्च एकाग्रं च मनोऽभवत् ।
एकपादाः स्थिताः सर्वे काष्ठभूताः समाहिताः ॥ ४७ ॥
उनकी आँखें ऊपरकी ओर लगी थीं, भुजाएँ भी ऊपरकी ओर ही उठी हुई थीं। मन एकाग्र था। वे सब-के-सब समाहितचित्त हो एक पैरसे खड़े हो काष्ठके समान जान पड़ते थे ॥ ४७ ॥
दिव्यं वर्षसहस्रं ते तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।
शुश्रुवुर्मधुरां वाणीं वेदवेदाङ्गभूषिताम् ॥ ४८ ॥
एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या करनेके पश्चात् उन्हें वेद और वेदांगोंसे विभूषित मधुर वाणी सुनायी दी ॥ ४८ ॥

श्रीभगवानुवाच

भो भोः सब्रह्मका देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
स्वागतेनार्च्य वः सर्वान् श्रावये वाक्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे तपस्याके धनी ब्रह्मा आदि देवताओ तथा ऋषियो! मैं स्वागतके द्वारा तुम सबका सत्कार करके तुम्हें यह उत्तम वचन सुनाता हूँ ॥ ४९ ॥
विज्ञातं वो मया कार्यं तच्च लोकहितं महत् ।
प्रवृत्तियुक्तं कर्तव्यं युष्मत्प्राणोपबृंहणम् ॥ ५० ॥

तुम्हारा प्रयोजन क्या है? यह मुझे ज्ञात हो गया है। वह सम्पूर्ण जगत्के लिये अत्यन्त हितकर है। तुम्हें प्रवृत्तियुक्त धर्मका पालन करना चाहिये। वह तुम्हारे प्राणोंका पोषक तथा शक्तिका संवर्द्धन करनेवाला होगा ॥ ५० ॥

सुतप्तं च तपो देवा ममाराधनकाम्यया ।
भोक्ष्यथास्य महासत्त्वास्तपसः फलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
महान् धैर्यशाली देवताओ! तुमलोगोंने मेरी आराधनाकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या की है। उस तपस्याके उत्तम फलका तुम अवश्य उपभोग करोगे ॥ ५१ ॥

एष ब्रह्मा लोकगुरुर्महान् लोकपितामहः ।
यूयं च विबुधश्रेष्ठा मां यजध्वं समाहिताः ॥ ५२ ॥
ये सम्पूर्ण जगत्के महान् गुरु लोकपितामह ब्रह्मा और तुम सभी श्रेष्ठ देवगण एकाग्रचित्त हो यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करो ॥ ५२ ॥

सर्वे भागान् कल्पयध्वं यज्ञेषु मम नित्यशः ।
तथा श्रेयोऽभिधास्यामि यथाधीकारमीश्वराः ॥ ५३ ॥
लोकेश्वरो! तुम सब लोग यज्ञोंमें सदा मेरे लिये भाग समर्पित करते रहो। ऐसा होनेपर मैं तुम्हें तुम्हारे अधिकारके अनुसार कल्याणमार्गका उपदेश करता रहूँगा ॥ ५३ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैतद् देवदेवस्य वाक्यं हृष्टतनूरुहाः ।
ततस्ते विबुधाः सर्वे ब्रह्मा ते च महर्षयः ॥ ५४ ॥
वेददृष्टेन विधिना वैष्णवं क्रतुमाहरन् ।
तस्मिन् सत्रे सदा ब्रह्मा स्वयं भागमकल्पयत् ॥ ५५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवाधिदेव भगवान् नारायणका यह वचन सुनकर उन सबके रोम हर्षसे खिल उठे। तदनन्तर उन सब देवताओं, महर्षियों और ब्रह्माजीने वेदोक्त विधिसे वैष्णव यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें ब्रह्माजीने स्वयं भगवान्‌के लिये भाग निश्चित किया ॥ ५४-५५ ॥

देवा देवर्षयश्चैव स्वं स्वं भागमकल्पयन् ।
ते कार्तयुगधर्माणो भागाः परमसत्कृताः ॥ ५६ ॥
उसी प्रकार देवताओं और देवर्षियोंने भी अपना-अपना भाग भगवान्‌के लिये निश्चित किया। सत्ययुगके न्यायानुसार निश्चित किये हुए वे उत्तम यज्ञ-भाग सबके द्वारा अत्यन्त सत्कृत हुए ॥ ५६ ॥

प्राहुरादित्यवर्णं तं पुरुषं तमसः परम् ।
बृहन्तं सर्वगं देवमीशानं वरदं प्रभुम् ॥ ५७ ॥

ऋषि कहते हैं कि 'भगवान् नारायण सूर्यके समान तेजस्वी, अन्तर्यामी पुरुष, अज्ञानान्धकारसे परे, सर्वव्यापी, सर्वगामी, ईश्वर, वरदाता और सर्वसमर्थ हैं' ॥ ५७ ॥ ततोऽथ वरदो देवस्तान् सर्वानमरान् स्थितान् । अशरीरो बभाषेदं वाक्यं खस्थो महेश्वरः ॥ ५८ ॥ यज्ञभाग निश्चित हो जानेपर उन वरदायक देवता महेश्वर नारायणदेवने आकाशमें बिना शरीरके ही स्थित हो वहाँ खड़े हुए उन समस्त देवताओंसे यह बात कही— ॥ ५८ ॥ येन यः कल्पितो भागः स तथा मामुपागतः । प्रीतोऽहं प्रदिशाम्यद्य फलमावृत्तिलक्षणम् ॥ ५९ ॥ 'देवताओ! जिसने जो भाग हमारे लिये निश्चित किया था, वह उसी रूपमें मुझे प्राप्त हो गया। इससे प्रसन्न होकर आज मैं तुम्हें पुनरावृत्तिरूप फल प्रदान करता हूँ ॥ ५९ ॥ एतद् वो लक्षणं देवा मत्प्रसादसमुद्भवम् । स्वयं यज्ञैर्यजमानाः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ६० ॥ युगे युगे भविष्यध्वं प्रवृत्तिफलभागिनः । 'देवताओ! मेरी कृपासे तुम्हारा ऐसा ही लक्षण होगा। तुम प्रत्येक युगमें उत्तम दक्षिणाओंसे संयुक्त यज्ञोंद्वारा यजन करके प्रवृत्तिरूप धर्मफलके भागी होओगे ॥ ६० १/२ ॥ यज्ञैर्यै चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः ॥ ६१ ॥ कल्पयिष्यन्ति वो भागांस्ते नरा वेदकल्पितान् । 'देवगण! सम्पूर्ण लोकोंमें जो मनुष्य यज्ञोंद्वारा यजन करेंगे, वे तुम्हारे लिये वेदके कथनानुसार यज्ञभाग निश्चित करेंगे ॥ ६१ १/२ ॥ यो मे यथा कल्पितवान् भागमस्मिन् महाक्रतौ ॥ ६२ ॥ स तथा यज्ञभागार्हो वेदसूत्रे मया कृतः । 'इस महान् यज्ञमें जिस देवताने मेरे लिये जैसा भाग निश्चित किया है, वह वैदिक सूत्रमें मेरेद्वारा वैसे ही यज्ञभागका अधिकारी बनाया गया ॥ ६२ १/२ ॥ यूयं लोकान् भावयध्वं यज्ञभागफलोचिताः ॥ ६३ ॥ सर्वार्थचिन्तका लोके यथाधिकारनिर्मिताः । 'तुमलोग यज्ञमें भाग लेकर यजमानको उसका फल देनेमें प्रवृत्त हो जगत्में अपने अधिकारके अनुसार सबके सभी मनोरथोंका चिन्तन करते हुए सब लोगोंको उन्नतिशील बनाओ ॥ ६३ १/२ ॥ याः क्रियाः प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृताः ॥ ६४ ॥ आभिराप्यायितबला लोकान् वै धारयिष्यथ ।

'प्रवृत्ति-फलसे समादृत होनेवाली जिन यज्ञ-क्रियाओंका जगत्‌में प्रचार होगा, उन्हींसे तुम्हारे बलकी वृद्धि होगी और बलिष्ठ होकर तुमलोग सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करोगे ।। ६४ १/२ ।।

यूयं हि भाविता यज्ञैः सर्वयज्ञेषु मानवैः ।। ६५ ।।
मां ततो भावयिष्यध्वमेषा वो भावना मम ।
'सम्पूर्ण यज्ञोंमें मनुष्य तुम्हारा यजन करके तुम्हें उन्नतिशील एवं पुष्ट बनायेंगे, फिर तुमलोग भी मुझे इसी प्रकार परिपुष्ट करोगे। यही तुम्हारे लिये मेरा उपदेश है ।। ६५ १/२ ।।

इत्यर्थं निर्मिता वेदा यज्ञाश्चौषधिभिः सह ।। ६६ ।।
एभिः सम्यक् प्रयुक्तैर्हि प्रीयन्ते देवताः क्षितौ ।
'इसीके लिये मैंने वेदों तथा ओषधियों (अन्न-फल आदि) सहित यज्ञोंकी सृष्टि की है। इनका भलीभाँति पृथ्वीपर अनुष्ठान होनेसे सम्पूर्ण देवता तृप्त होंगे ।। ६६ १/२ ।।

निर्माणमेतद् युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम् ।। ६७ ।।
मया कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षयादिह ।
चिन्तयध्वं लोकहितं यथाधिकारमीश्वराः ।। ६८ ।।
'देवश्रेष्ठगण! मैंने प्रवृत्तिप्रधान गुणके सहित तुमलोगोंकी सृष्टि की है, अतः लोकेश्वरो! जबतक कल्पका अन्त न हो जाय, तबतक तुमलोग अपने अधिकारके अनुसार लोगोंका हितचिन्तन करते रहो ।।

मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। ६९ ।।
'मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ—ये सात ऋषि ब्रह्माजीके द्वारा मनसे उत्पन्न किये गये हैं ।। ६९ ।।

एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः ।
प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ।। ७० ।।
'ये प्रधान वेदवेत्ता और प्रवृत्ति-धर्मावलम्बी हैं। इन सबको वेदाचार्य माना गया है और प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित किया गया है ।। ७० ।।

अयं क्रियावतां पन्था व्यक्तीभूतः सनातनः ।
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ।। ७१ ।।
'यह कर्मपरायण पुरुषोंके लिये सनातन मार्ग प्रकट हुआ है। इस पद्धतिसे लोकोंकी सृष्टि करनेवाले प्रभावशाली पुरुषको अनिरुद्ध कहा गया है ।। ७१ ।।

सनः सनत्सुजातश्च सनकः ससनन्दनः ।
सनत्कुमारः कपिलः सप्तमश्च सनातनः ।। ७२ ।।
सप्तैते मानसाः प्रोक्ता ऋषयो ब्रह्मणः सुताः ।
स्वयमागतविज्ञाना निवृत्तिं धर्ममास्थिताः ।। ७३ ।।

‘सन, सनत्सुजात, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल तथा सातवें सनातन—ये सात ऋषि भी ब्रह्माके मानस पुत्र कहे गये हैं। इन्हें स्वयं विज्ञान प्राप्त है और ये निवृत्तिधर्ममें स्थित हैं।। ७२-७३।।

एते योगविदो मुख्याः सांख्यज्ञानविशारदाः।
आचार्या धर्मशास्त्रेषु मोक्षधर्मप्रवर्तकाः॥ ७४॥
‘ये प्रमुख योगवेत्ता, सांख्यज्ञान-विशारद, धर्मशास्त्रोंके आचार्य तथा मोक्षधर्मके प्रवर्तक हैं।। ७४।।

यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात् त्रिगुणो महान्।
तस्मात् परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः॥ ७५॥
‘पूर्वकालमें अव्यक्त प्रकृतिसे जो त्रिगुणात्मक महान् अहंकार प्रकट हुआ था, उससे अत्यन्त परे जिसकी स्थिति है, वह समष्टि चेतन क्षेत्रज्ञ माना गया है।। ७५।।

सोऽहं क्रियावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः।
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन् यस्मिंश्च कर्मणि॥ ७६॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुते महत्।
‘वह क्षेत्रज्ञ मैं हूँ। जो कर्मपरायण मनुष्य हैं, वे पुनरावृत्तिशील हैं; अतः उनके लिये यह निवृत्तिमार्ग दुर्लभ है। जिस प्राणीका जिस प्रकार निर्माण हुआ है तथा वह जिस-जिस प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप कर्ममें संलग्न होता है, वह उसीके महान् फलका भागी होता है।। ७६ १/२।।

एष लोकगुरुर्ब्रह्मा जगदादिकरः प्रभुः॥ ७७॥
एष माता पिता चैव युष्माकं च पितामहः।
मयानुशिष्टो भविता सर्वभूतवरप्रदः॥ ७८॥
‘ये लोकगुरु ब्रह्मा जगत्के आदि स्रष्टा और प्रभु हैं। ये ही तुम्हारे माता-पिता और पितामह हैं। मेरी आज्ञाके अनुसार ये सम्पूर्ण भूतोंको वर प्रदान करनेवाले होंगे।। ७७-७८।।

अस्य चैवात्मजो रुद्रो ललाटाद् यः समुत्थितः।
ब्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वभूतधरः प्रभुः॥ ७९॥
‘इनके ललाटसे जो रुद्र उत्पन्न हुए हैं, वे भी इन (ब्रह्माजी) के ही पुत्र हैं। ब्रह्माजीकी आज्ञासे वे सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ होंगे।। ७९।।

गच्छध्वं स्वानधिकारांश्चिन्तयध्वं यथाविधि।
प्रवर्तन्तां क्रियाः सर्वाः सर्वलोकेषु मा चिरम्॥ ८०॥
‘तुम सब लोग जाओ और अपने-अपने अधिकारोंका विधिपूर्वक पालन करो। समस्त लोकोंमें सम्पूर्ण वैदिक क्रियाएँ अविलम्ब प्रचलित हो जानी चाहिये।। ८०।।

प्रदिश्यन्तां च कर्माणि प्राणिनां गतयस्तथा।

परिनिश्चितकालानि आयूंषीह सुरोत्तमाः ॥ ८१ ॥
‘सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग प्राणियोंको उनके कर्म, उन कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली गति तथा नियत कालतककी आयु प्रदान करो ॥ ८१ ॥
इदं कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तितः ।
अहिंस्या यज्ञपशवो युगेऽस्मिन् न तदन्यथा ॥ ८२ ॥
‘यह सत्ययुग नामक श्रेष्ठ समय चल रहा है। इस युगमें यज्ञ-पशुओंकी हिंसा नहीं की जाती। अहिंसा-धर्मके विपरीत यहाँ कुछ भी नहीं होता है ॥ ८२ ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मो भविष्यत्यत्र वै सुराः ।
ततस्त्रेतायुगं नाम त्रयी यत्र भविष्यति ॥ ८३ ॥
‘देवताओ! इस सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त सम्पूर्ण धर्मका पालन होगा। तदनन्तर त्रेतायुग आयेगा, जिसमें वेदत्रयीका प्रचार होगा ॥ ८३ ॥
प्रोक्षिता यत्र पशवो वधं प्राप्स्यन्ति वै मखे ।
यत्र पादश्चतुर्थो वै धर्मस्य न भविष्यति ॥ ८४ ॥
‘उस युगमें यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये गये पशुओंका वध किया जायगा* और धर्मका एक पाद—चतुर्थ अंश कम हो जायगा ॥ ८४ ॥
ततो वै द्वापरं नाम मिश्रः कालो भविष्यति ।
द्विपादहीनो धर्मश्च युगे तस्मिन् भविष्यति ॥ ८५ ॥
‘उसके बाद द्वापर युगका आगमन होगा। वह समय धर्म और अधर्मके सम्मिश्रणसे युक्त होगा। उस युगमें धर्मके दो चरण नष्ट हो जायँगे ॥ ८५ ॥
ततस्तिष्येऽथ सम्प्राप्ते युगे कलिपुरस्कृते ।
एकपादस्थितो धर्मो यत्र तत्र भविष्यति ॥ ८६ ॥
‘तदनन्तर पुष्य नक्षत्रमें कलियुगका पदार्पण होगा। उस समय यत्र-तत्र धर्मका एक चरण ही शेष रह जायगा’ ॥ ८६ ॥
देवा देवर्षयश्चोचुस्तमेवंवादिनं गुरुम् ।
एकपादस्थिते धर्मे यत्र क्वचन गामिनि ॥ ८७ ॥
कथं कर्तव्यमस्माभिर्भगवंस्तद् वदस्व नः ।
तब देवताओं और देवर्षियोंने उपर्युक्त बात कहनेवाले गुरुस्वरूप भगवान्‌से कहा—‘भगवन्! जब कलियुगमें जहाँ-कहीं भी धर्मका एक ही चरण अवशिष्ट रहेगा, तब हमें क्या करना होगा? यह बताइये’ ॥ ८७ १/२ ॥

श्रीभगवानुवाच

यत्र वेदाश्च यज्ञाश्च तपः सत्यं दमस्तथा ॥ ८८ ॥
अहिंसाधर्मसंयुक्ताः प्रचरेयुः सुरोत्तमाः ।

स वो देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ॥ ८९ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**सुरश्रेष्ठगण! जहाँ वेद, यज्ञ, तप, सत्य, इन्द्रियसंयम और अहिंसाधर्म प्रचलित हों, उसी देशका तुम्हें सेवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हें अधर्म अपने एक पैरसे भी नहीं छू सकेगा ॥

व्यास उवाच

तेऽनुशिष्टा भगवता देवाः सर्षिगणास्तथा । नमस्कृत्या भगवते जग्मुर्देशान् यथेप्सितान् ॥ ९० ॥ **व्यासजी कहते हैं—**शिष्यो! भगवान्‌का यह उपदेश पाकर ऋषियोंसहित देवता उन्हें नमस्कार करके अपने अभीष्ट देशोंको चले गये ॥ ९० ॥ गतेषु त्रिदिवौकःसु ब्रह्मैकः पर्यवस्थितः । दिदृक्षुर्भगवन्तं तमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥ ९१ ॥ स्वर्गवासी देवताओंके चले जानेपर अकेले ब्रह्माजी ही वहाँ खड़े रहे। वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित भगवान् श्रीहरिका दर्शन करना चाहते थे ॥ ९१ ॥ तं देवो दर्शयामास कृत्वा हयशिरो महत् । साङ्गानावर्तयन् वेदान् कमण्डलुत्रिदण्डधृक् ॥ ९२ ॥ तब भगवान्‌ने महान् हयग्रीवरूप धारण करके ब्रह्माजीको दर्शन दिया। वे कमण्डलु और त्रिदण्ड धारण करके छहों अंगोंसहित वेदोंकी आवृत्ति कर रहे थे ॥ ९२ ॥ ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् । लोककर्ता प्रभुर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ ९३ ॥ मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः । स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ॥ ९४ ॥ उस समय अमित पराक्रमी भगवान् हयग्रीवका दर्शन करके सम्पूर्ण जगत्‌के हितकी कामनासे लोककर्ता भगवान् ब्रह्माने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उन वरदायक देवताके सम्मुख वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब भगवान्‌ने उनको हृदयसे लगाकर यह बात सुनायी ॥ ९३-९४ ॥

श्रीभगवानुवाच

लोककार्यगतीः सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि । धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः ॥ ९५ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! तुम सम्पूर्ण लोकोंके समस्त कर्मों और उनसे मिलनेवाली गतियोंका विधिपूर्वक चिन्तन करो; क्योंकि तुम्हीं सम्पूर्ण प्राणियोंके धाता हो, तुम्हीं सबके प्रभु हो और तुम्हीं इस जगत्‌के गुरु हो ॥ ९५ ॥ त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ।

यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति ॥ ९६ ॥ प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिकः । एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ९७ ॥ तुमपर यह भार रखकर मैं अनायास ही धैर्य धारण करूँगा। जब कभी तुम्हारे लिये देवताओंका कार्य असह्य हो जायगा, तब मैं आत्मज्ञानका उपदेश देनेके लिये तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा। ऐसा कहकर भगवान् हयग्रीव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९६-९७ ॥ तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वलोकमचिराद् गतः । एवमेष महाभागः पद्मनाभः सनातनः ॥ ९८ ॥ यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा । निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम् । प्रवृत्तिधर्मान् विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ॥ ९९ ॥ भगवान्‌का यह उपदेश पाकर ब्रह्मा भी शीघ्र ही अपने लोकको चले गये। इस प्रकार ये महाभाग सनातन पुरुष भगवान् पद्मनाभ यज्ञोंमें अग्रभोक्ता और सदा ही यज्ञके पोषक एवं प्रवर्तक बताये गये हैं। वे कभी अक्षयधर्मी महात्माओंके निवृत्तिधर्मका आश्रय लेते हैं और कभी लोककी विचित्र चित्तवृत्ति करके प्रवृत्तिधर्मका विधान करते हैं ॥ ९८-९९ ॥ स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम् । युगान्ते प्रसुप्तः सुसंक्षिप्य लोकान् युगादौ प्रबुद्धो जगद्द्युत्ससर्ज ॥ १०० ॥ वे ही भगवान् नारायण प्रजाके आदि, मध्य और अन्त हैं। वे ही धाता, धेय, कर्ता और कार्य हैं। वे ही युगान्तके समय सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके सो जाते हैं और वे ही कल्पके आदिमें जाग्रत् हो सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करते हैं ॥ १०० ॥ तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने । अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम् ॥ १०१ ॥ शिष्यो! तुम उन्हीं अजन्मा, विश्वरूप, सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय निर्गुण परमात्मा नारायणदेवको नमस्कार करो ॥ १०१ ॥ महाभूताधिपतये रुद्राणां पतये तथा । आदित्यपतये चैव वसूनां पतये तथा ॥ १०२ ॥ वे ही महाभूतोंके अधिपति तथा रुद्रों, आदित्यों और वसुओंके स्वामी हैं। उन्हें नमस्कार करो ॥ १०२ ॥ अश्विभ्यां पतये चैव मरुतां पतये तथा । वेदयज्ञाधिपतये वेदाङ्गपतयेऽपि च ॥ १०३ ॥