भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2299

कथं बलक्षयो न स्याद् युष्माकं ह्यात्मनश्च मे ॥ ४३ ॥
किस प्रकार तीनों लोकोंके अधिकृत कार्यका सम्पादन किया जाय तथा किस तरह तुम्हारी और मेरी शक्तिका भी क्षय न हो ॥ ४३ ॥
इतः सर्वेऽपि गच्छामः शरणं लोकसाक्षिणम् ।
महापुरुषमव्यक्तं स नो वक्ष्यति यद्धितम् ॥ ४४ ॥
हम सब लोग यहाँसे अव्यक्त लोकसाक्षी महापुरुष नारायणदेवकी शरणमें चलें। वे हमारे लिये हितकी बात बतायेंगे ॥ ४४ ॥
ततस्ते ब्रह्मणा सार्धमृषयो विबुधास्तथा ।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जग्मुर्लोकहितार्थिनः ॥ ४५ ॥
तदनन्तर वे सब ऋषि और देवता सम्पूर्ण जगत्के हितकी भावना लेकर ब्रह्माजीके साथ क्षीरसागरके उत्तर तटपर गये ॥ ४५ ॥
ते तपः समुपातिष्ठन् ब्रह्मोक्तं वेदकल्पितम् ।
स महानियमो नाम तपश्चर्यासु दारुणः ॥ ४६ ॥
वहाँ ब्रह्माजीके कथनानुसार उन सबने वेदोक्त रीतिसे तपस्या आरम्भ की। उनका वह महान् नियम सभी तपस्याओंमें कठोर था ॥ ४६ ॥
ऊर्ध्वा दृष्टिर्बाहवश्च एकाग्रं च मनोऽभवत् ।
एकपादाः स्थिताः सर्वे काष्ठभूताः समाहिताः ॥ ४७ ॥
उनकी आँखें ऊपरकी ओर लगी थीं, भुजाएँ भी ऊपरकी ओर ही उठी हुई थीं। मन एकाग्र था। वे सब-के-सब समाहितचित्त हो एक पैरसे खड़े हो काष्ठके समान जान पड़ते थे ॥ ४७ ॥
दिव्यं वर्षसहस्रं ते तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।
शुश्रुवुर्मधुरां वाणीं वेदवेदाङ्गभूषिताम् ॥ ४८ ॥
एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या करनेके पश्चात् उन्हें वेद और वेदांगोंसे विभूषित मधुर वाणी सुनायी दी ॥ ४८ ॥

श्रीभगवानुवाच

भो भोः सब्रह्मका देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
स्वागतेनार्च्य वः सर्वान् श्रावये वाक्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे तपस्याके धनी ब्रह्मा आदि देवताओ तथा ऋषियो! मैं स्वागतके द्वारा तुम सबका सत्कार करके तुम्हें यह उत्तम वचन सुनाता हूँ ॥ ४९ ॥
विज्ञातं वो मया कार्यं तच्च लोकहितं महत् ।
प्रवृत्तियुक्तं कर्तव्यं युष्मत्प्राणोपबृंहणम् ॥ ५० ॥