भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2300

तुम्हारा प्रयोजन क्या है? यह मुझे ज्ञात हो गया है। वह सम्पूर्ण जगत्के लिये अत्यन्त हितकर है। तुम्हें प्रवृत्तियुक्त धर्मका पालन करना चाहिये। वह तुम्हारे प्राणोंका पोषक तथा शक्तिका संवर्द्धन करनेवाला होगा ॥ ५० ॥

सुतप्तं च तपो देवा ममाराधनकाम्यया ।
भोक्ष्यथास्य महासत्त्वास्तपसः फलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
महान् धैर्यशाली देवताओ! तुमलोगोंने मेरी आराधनाकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या की है। उस तपस्याके उत्तम फलका तुम अवश्य उपभोग करोगे ॥ ५१ ॥

एष ब्रह्मा लोकगुरुर्महान् लोकपितामहः ।
यूयं च विबुधश्रेष्ठा मां यजध्वं समाहिताः ॥ ५२ ॥
ये सम्पूर्ण जगत्के महान् गुरु लोकपितामह ब्रह्मा और तुम सभी श्रेष्ठ देवगण एकाग्रचित्त हो यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करो ॥ ५२ ॥

सर्वे भागान् कल्पयध्वं यज्ञेषु मम नित्यशः ।
तथा श्रेयोऽभिधास्यामि यथाधीकारमीश्वराः ॥ ५३ ॥
लोकेश्वरो! तुम सब लोग यज्ञोंमें सदा मेरे लिये भाग समर्पित करते रहो। ऐसा होनेपर मैं तुम्हें तुम्हारे अधिकारके अनुसार कल्याणमार्गका उपदेश करता रहूँगा ॥ ५३ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैतद् देवदेवस्य वाक्यं हृष्टतनूरुहाः ।
ततस्ते विबुधाः सर्वे ब्रह्मा ते च महर्षयः ॥ ५४ ॥
वेददृष्टेन विधिना वैष्णवं क्रतुमाहरन् ।
तस्मिन् सत्रे सदा ब्रह्मा स्वयं भागमकल्पयत् ॥ ५५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवाधिदेव भगवान् नारायणका यह वचन सुनकर उन सबके रोम हर्षसे खिल उठे। तदनन्तर उन सब देवताओं, महर्षियों और ब्रह्माजीने वेदोक्त विधिसे वैष्णव यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें ब्रह्माजीने स्वयं भगवान्‌के लिये भाग निश्चित किया ॥ ५४-५५ ॥

देवा देवर्षयश्चैव स्वं स्वं भागमकल्पयन् ।
ते कार्तयुगधर्माणो भागाः परमसत्कृताः ॥ ५६ ॥
उसी प्रकार देवताओं और देवर्षियोंने भी अपना-अपना भाग भगवान्‌के लिये निश्चित किया। सत्ययुगके न्यायानुसार निश्चित किये हुए वे उत्तम यज्ञ-भाग सबके द्वारा अत्यन्त सत्कृत हुए ॥ ५६ ॥

प्राहुरादित्यवर्णं तं पुरुषं तमसः परम् ।
बृहन्तं सर्वगं देवमीशानं वरदं प्रभुम् ॥ ५७ ॥