महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2301, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋषि कहते हैं कि 'भगवान् नारायण सूर्यके समान तेजस्वी, अन्तर्यामी पुरुष, अज्ञानान्धकारसे परे, सर्वव्यापी, सर्वगामी, ईश्वर, वरदाता और सर्वसमर्थ हैं' ॥ ५७ ॥ ततोऽथ वरदो देवस्तान् सर्वानमरान् स्थितान् । अशरीरो बभाषेदं वाक्यं खस्थो महेश्वरः ॥ ५८ ॥ यज्ञभाग निश्चित हो जानेपर उन वरदायक देवता महेश्वर नारायणदेवने आकाशमें बिना शरीरके ही स्थित हो वहाँ खड़े हुए उन समस्त देवताओंसे यह बात कही— ॥ ५८ ॥ येन यः कल्पितो भागः स तथा मामुपागतः । प्रीतोऽहं प्रदिशाम्यद्य फलमावृत्तिलक्षणम् ॥ ५९ ॥ 'देवताओ! जिसने जो भाग हमारे लिये निश्चित किया था, वह उसी रूपमें मुझे प्राप्त हो गया। इससे प्रसन्न होकर आज मैं तुम्हें पुनरावृत्तिरूप फल प्रदान करता हूँ ॥ ५९ ॥ एतद् वो लक्षणं देवा मत्प्रसादसमुद्भवम् । स्वयं यज्ञैर्यजमानाः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ६० ॥ युगे युगे भविष्यध्वं प्रवृत्तिफलभागिनः । 'देवताओ! मेरी कृपासे तुम्हारा ऐसा ही लक्षण होगा। तुम प्रत्येक युगमें उत्तम दक्षिणाओंसे संयुक्त यज्ञोंद्वारा यजन करके प्रवृत्तिरूप धर्मफलके भागी होओगे ॥ ६० १/२ ॥ यज्ञैर्यै चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः ॥ ६१ ॥ कल्पयिष्यन्ति वो भागांस्ते नरा वेदकल्पितान् । 'देवगण! सम्पूर्ण लोकोंमें जो मनुष्य यज्ञोंद्वारा यजन करेंगे, वे तुम्हारे लिये वेदके कथनानुसार यज्ञभाग निश्चित करेंगे ॥ ६१ १/२ ॥ यो मे यथा कल्पितवान् भागमस्मिन् महाक्रतौ ॥ ६२ ॥ स तथा यज्ञभागार्हो वेदसूत्रे मया कृतः । 'इस महान् यज्ञमें जिस देवताने मेरे लिये जैसा भाग निश्चित किया है, वह वैदिक सूत्रमें मेरेद्वारा वैसे ही यज्ञभागका अधिकारी बनाया गया ॥ ६२ १/२ ॥ यूयं लोकान् भावयध्वं यज्ञभागफलोचिताः ॥ ६३ ॥ सर्वार्थचिन्तका लोके यथाधिकारनिर्मिताः । 'तुमलोग यज्ञमें भाग लेकर यजमानको उसका फल देनेमें प्रवृत्त हो जगत्में अपने अधिकारके अनुसार सबके सभी मनोरथोंका चिन्तन करते हुए सब लोगोंको उन्नतिशील बनाओ ॥ ६३ १/२ ॥ याः क्रियाः प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृताः ॥ ६४ ॥ आभिराप्यायितबला लोकान् वै धारयिष्यथ ।