महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2302, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'प्रवृत्ति-फलसे समादृत होनेवाली जिन यज्ञ-क्रियाओंका जगत्में प्रचार होगा, उन्हींसे तुम्हारे बलकी वृद्धि होगी और बलिष्ठ होकर तुमलोग सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करोगे ।। ६४ १/२ ।।
यूयं हि भाविता यज्ञैः सर्वयज्ञेषु मानवैः ।। ६५ ।।
मां ततो भावयिष्यध्वमेषा वो भावना मम ।
'सम्पूर्ण यज्ञोंमें मनुष्य तुम्हारा यजन करके तुम्हें उन्नतिशील एवं पुष्ट बनायेंगे, फिर तुमलोग भी मुझे इसी प्रकार परिपुष्ट करोगे। यही तुम्हारे लिये मेरा उपदेश है ।। ६५ १/२ ।।
इत्यर्थं निर्मिता वेदा यज्ञाश्चौषधिभिः सह ।। ६६ ।।
एभिः सम्यक् प्रयुक्तैर्हि प्रीयन्ते देवताः क्षितौ ।
'इसीके लिये मैंने वेदों तथा ओषधियों (अन्न-फल आदि) सहित यज्ञोंकी सृष्टि की है। इनका भलीभाँति पृथ्वीपर अनुष्ठान होनेसे सम्पूर्ण देवता तृप्त होंगे ।। ६६ १/२ ।।
निर्माणमेतद् युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम् ।। ६७ ।।
मया कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षयादिह ।
चिन्तयध्वं लोकहितं यथाधिकारमीश्वराः ।। ६८ ।।
'देवश्रेष्ठगण! मैंने प्रवृत्तिप्रधान गुणके सहित तुमलोगोंकी सृष्टि की है, अतः लोकेश्वरो! जबतक कल्पका अन्त न हो जाय, तबतक तुमलोग अपने अधिकारके अनुसार लोगोंका हितचिन्तन करते रहो ।।
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। ६९ ।।
'मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ—ये सात ऋषि ब्रह्माजीके द्वारा मनसे उत्पन्न किये गये हैं ।। ६९ ।।
एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः ।
प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ।। ७० ।।
'ये प्रधान वेदवेत्ता और प्रवृत्ति-धर्मावलम्बी हैं। इन सबको वेदाचार्य माना गया है और प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित किया गया है ।। ७० ।।
अयं क्रियावतां पन्था व्यक्तीभूतः सनातनः ।
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ।। ७१ ।।
'यह कर्मपरायण पुरुषोंके लिये सनातन मार्ग प्रकट हुआ है। इस पद्धतिसे लोकोंकी सृष्टि करनेवाले प्रभावशाली पुरुषको अनिरुद्ध कहा गया है ।। ७१ ।।
सनः सनत्सुजातश्च सनकः ससनन्दनः ।
सनत्कुमारः कपिलः सप्तमश्च सनातनः ।। ७२ ।।
सप्तैते मानसाः प्रोक्ता ऋषयो ब्रह्मणः सुताः ।
स्वयमागतविज्ञाना निवृत्तिं धर्ममास्थिताः ।। ७३ ।।