भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2303

‘सन, सनत्सुजात, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल तथा सातवें सनातन—ये सात ऋषि भी ब्रह्माके मानस पुत्र कहे गये हैं। इन्हें स्वयं विज्ञान प्राप्त है और ये निवृत्तिधर्ममें स्थित हैं।। ७२-७३।।

एते योगविदो मुख्याः सांख्यज्ञानविशारदाः।
आचार्या धर्मशास्त्रेषु मोक्षधर्मप्रवर्तकाः॥ ७४॥
‘ये प्रमुख योगवेत्ता, सांख्यज्ञान-विशारद, धर्मशास्त्रोंके आचार्य तथा मोक्षधर्मके प्रवर्तक हैं।। ७४।।

यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात् त्रिगुणो महान्।
तस्मात् परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः॥ ७५॥
‘पूर्वकालमें अव्यक्त प्रकृतिसे जो त्रिगुणात्मक महान् अहंकार प्रकट हुआ था, उससे अत्यन्त परे जिसकी स्थिति है, वह समष्टि चेतन क्षेत्रज्ञ माना गया है।। ७५।।

सोऽहं क्रियावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः।
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन् यस्मिंश्च कर्मणि॥ ७६॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुते महत्।
‘वह क्षेत्रज्ञ मैं हूँ। जो कर्मपरायण मनुष्य हैं, वे पुनरावृत्तिशील हैं; अतः उनके लिये यह निवृत्तिमार्ग दुर्लभ है। जिस प्राणीका जिस प्रकार निर्माण हुआ है तथा वह जिस-जिस प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप कर्ममें संलग्न होता है, वह उसीके महान् फलका भागी होता है।। ७६ १/२।।

एष लोकगुरुर्ब्रह्मा जगदादिकरः प्रभुः॥ ७७॥
एष माता पिता चैव युष्माकं च पितामहः।
मयानुशिष्टो भविता सर्वभूतवरप्रदः॥ ७८॥
‘ये लोकगुरु ब्रह्मा जगत्के आदि स्रष्टा और प्रभु हैं। ये ही तुम्हारे माता-पिता और पितामह हैं। मेरी आज्ञाके अनुसार ये सम्पूर्ण भूतोंको वर प्रदान करनेवाले होंगे।। ७७-७८।।

अस्य चैवात्मजो रुद्रो ललाटाद् यः समुत्थितः।
ब्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वभूतधरः प्रभुः॥ ७९॥
‘इनके ललाटसे जो रुद्र उत्पन्न हुए हैं, वे भी इन (ब्रह्माजी) के ही पुत्र हैं। ब्रह्माजीकी आज्ञासे वे सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ होंगे।। ७९।।

गच्छध्वं स्वानधिकारांश्चिन्तयध्वं यथाविधि।
प्रवर्तन्तां क्रियाः सर्वाः सर्वलोकेषु मा चिरम्॥ ८०॥
‘तुम सब लोग जाओ और अपने-अपने अधिकारोंका विधिपूर्वक पालन करो। समस्त लोकोंमें सम्पूर्ण वैदिक क्रियाएँ अविलम्ब प्रचलित हो जानी चाहिये।। ८०।।

प्रदिश्यन्तां च कर्माणि प्राणिनां गतयस्तथा।