महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2305, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस वो देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ॥ ८९ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**सुरश्रेष्ठगण! जहाँ वेद, यज्ञ, तप, सत्य, इन्द्रियसंयम और अहिंसाधर्म प्रचलित हों, उसी देशका तुम्हें सेवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हें अधर्म अपने एक पैरसे भी नहीं छू सकेगा ॥
व्यास उवाच
तेऽनुशिष्टा भगवता देवाः सर्षिगणास्तथा । नमस्कृत्या भगवते जग्मुर्देशान् यथेप्सितान् ॥ ९० ॥ **व्यासजी कहते हैं—**शिष्यो! भगवान्का यह उपदेश पाकर ऋषियोंसहित देवता उन्हें नमस्कार करके अपने अभीष्ट देशोंको चले गये ॥ ९० ॥ गतेषु त्रिदिवौकःसु ब्रह्मैकः पर्यवस्थितः । दिदृक्षुर्भगवन्तं तमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥ ९१ ॥ स्वर्गवासी देवताओंके चले जानेपर अकेले ब्रह्माजी ही वहाँ खड़े रहे। वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित भगवान् श्रीहरिका दर्शन करना चाहते थे ॥ ९१ ॥ तं देवो दर्शयामास कृत्वा हयशिरो महत् । साङ्गानावर्तयन् वेदान् कमण्डलुत्रिदण्डधृक् ॥ ९२ ॥ तब भगवान्ने महान् हयग्रीवरूप धारण करके ब्रह्माजीको दर्शन दिया। वे कमण्डलु और त्रिदण्ड धारण करके छहों अंगोंसहित वेदोंकी आवृत्ति कर रहे थे ॥ ९२ ॥ ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् । लोककर्ता प्रभुर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ ९३ ॥ मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः । स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ॥ ९४ ॥ उस समय अमित पराक्रमी भगवान् हयग्रीवका दर्शन करके सम्पूर्ण जगत्के हितकी कामनासे लोककर्ता भगवान् ब्रह्माने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उन वरदायक देवताके सम्मुख वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब भगवान्ने उनको हृदयसे लगाकर यह बात सुनायी ॥ ९३-९४ ॥
श्रीभगवानुवाच
लोककार्यगतीः सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि । धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः ॥ ९५ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! तुम सम्पूर्ण लोकोंके समस्त कर्मों और उनसे मिलनेवाली गतियोंका विधिपूर्वक चिन्तन करो; क्योंकि तुम्हीं सम्पूर्ण प्राणियोंके धाता हो, तुम्हीं सबके प्रभु हो और तुम्हीं इस जगत्के गुरु हो ॥ ९५ ॥ त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ।