महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2306, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति ॥ ९६ ॥ प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिकः । एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ९७ ॥ तुमपर यह भार रखकर मैं अनायास ही धैर्य धारण करूँगा। जब कभी तुम्हारे लिये देवताओंका कार्य असह्य हो जायगा, तब मैं आत्मज्ञानका उपदेश देनेके लिये तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा। ऐसा कहकर भगवान् हयग्रीव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९६-९७ ॥ तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वलोकमचिराद् गतः । एवमेष महाभागः पद्मनाभः सनातनः ॥ ९८ ॥ यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा । निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम् । प्रवृत्तिधर्मान् विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ॥ ९९ ॥ भगवान्का यह उपदेश पाकर ब्रह्मा भी शीघ्र ही अपने लोकको चले गये। इस प्रकार ये महाभाग सनातन पुरुष भगवान् पद्मनाभ यज्ञोंमें अग्रभोक्ता और सदा ही यज्ञके पोषक एवं प्रवर्तक बताये गये हैं। वे कभी अक्षयधर्मी महात्माओंके निवृत्तिधर्मका आश्रय लेते हैं और कभी लोककी विचित्र चित्तवृत्ति करके प्रवृत्तिधर्मका विधान करते हैं ॥ ९८-९९ ॥ स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम् । युगान्ते प्रसुप्तः सुसंक्षिप्य लोकान् युगादौ प्रबुद्धो जगद्द्युत्ससर्ज ॥ १०० ॥ वे ही भगवान् नारायण प्रजाके आदि, मध्य और अन्त हैं। वे ही धाता, धेय, कर्ता और कार्य हैं। वे ही युगान्तके समय सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके सो जाते हैं और वे ही कल्पके आदिमें जाग्रत् हो सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ १०० ॥ तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने । अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम् ॥ १०१ ॥ शिष्यो! तुम उन्हीं अजन्मा, विश्वरूप, सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय निर्गुण परमात्मा नारायणदेवको नमस्कार करो ॥ १०१ ॥ महाभूताधिपतये रुद्राणां पतये तथा । आदित्यपतये चैव वसूनां पतये तथा ॥ १०२ ॥ वे ही महाभूतोंके अधिपति तथा रुद्रों, आदित्यों और वसुओंके स्वामी हैं। उन्हें नमस्कार करो ॥ १०२ ॥ अश्विभ्यां पतये चैव मरुतां पतये तथा । वेदयज्ञाधिपतये वेदाङ्गपतयेऽपि च ॥ १०३ ॥