भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2307

वे अश्विनीकुमारोंके पति, मरुद्गणोंके पालक, वेद और यज्ञोंके अधिपति तथा वेदांगोंके भी स्वामी हैं। उन्हें प्रणाम करो ।। १०३ ।।
समुद्रवासिने नित्यं हरये मुञ्जकेशिने ।
शान्ताय सर्वभूतानां मोक्षधर्मानुभाषिणे ।। १०४ ।।
जो सदा समुद्रमें निवास करते हैं, जिनका केश मूँजके समान है तथा जो समस्त प्राणियोंको मोक्षधर्मका उपदेश देते हैं, उन शान्तस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार करो ।। १०४ ।।
तपसां तेजसां चैव पतये यशसामपि ।
वचसां पतये नित्यं सरितां पतये तथा ।। १०५ ।।
जो तप, तेज, यश, वाणी तथा सरिताओंके स्वामी एवं नित्य संरक्षक हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार करो ।। १०५ ।।
कपर्दिने वराहाय एकशृङ्गाय धीमते ।
विवस्वतेऽश्वशिरसे चतुर्मूर्तिधृते सदा ।। १०६ ।।
जो जटाजूटधारी, एक सींगवाले वराह, बुद्धिमान् विवस्वान्, हयग्रीव तथा चतुर्मूर्तिधारी हैं, उन श्रीनारायण-देवको सदा नमस्कार करो ।। १०६ ।।
गुह्याय ज्ञानदृश्याय अक्षराय क्षराय च ।
एष देवः संचरति सर्वत्रगतिरव्ययः ।। १०७ ।।
जिनका स्वरूप गुह्य है, जो ज्ञानरूपी नेत्रसे ही देखे जाते हैं तथा अक्षर और क्षररूप हैं, उन श्रीहरिको प्रणाम करो। ये अविनाशी नारायणदेव सर्वत्र संचरण करते हैं; इनकी सर्वत्र गति है ।। १०७ ।।
एष चैतत् परं ब्रह्म ज्ञेयो विज्ञानचक्षुषा ।
एवमेतत् पुरा दृष्टं मया वै ज्ञानचक्षुषा ।। १०८ ।।
ये ही परब्रह्म हैं। विज्ञानमय नेत्रसे ही इनका दर्शन एवं ज्ञान हो सकता है। पूर्वकालमें मैंने ज्ञानदृष्टिसे ही इनका इस प्रकार साक्षात्कार किया था ।। १०८ ।।
कथितं तच्च वै सर्वं मया पृष्टेन तत्त्वतः ।
क्रियतां मद्वचः शिष्याः सेव्यतां हरिरीश्वरः ।
गीयतां वेदशब्दैश्च पूज्यतां च यथाविधि ।। १०९ ।।
शिष्यो! तुमलोगोंके पूछनेपर मैंने ये सारी बातें यथार्थरूपसे कही हैं। तुम मेरी बात मानो और सर्वेश्वर श्रीहरिका सेवन करो। वेदमन्त्रोंद्वारा उन्हींकी महिमाका गान और उन्हींका विधिपूर्वक पूजन करो ।। १०९ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तास्तु वयं तेन वेदव्यासेन धीमता ।