भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2308, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2308

सर्वे शिष्याः सुतश्चास्य शुकः परमधर्मवित् ॥ ११० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् वेदव्यासने हम सब शिष्योंको तथा अपने परम धर्मज्ञ पुत्र शुकदेवको ऐसा ही उपदेश दिया ॥ ११० ॥ स चास्माकमुपाध्यायः सहास्माभिर्विशाम्पते । चतुर्वेदोद्गताभिस्तमृग्भिः समभितुष्टुवे ॥ १११ ॥ प्रजानाथ! फिर हमारे उपाध्याय व्यासने हमारे साथ चारों वेदोंकी ऋचाओं‌द्वारा उन नारायणदेवका स्तवन किया ॥ १११ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । एवं मेऽकथयद् राजन् पुरा द्वैपायनो गुरुः ॥ ११२ ॥ राजन्! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। पूर्वकालमें मेरे गुरु व्यासजीने मुझे ऐसा ही उपदेश दिया था ॥ ११२ ॥ यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चैनं परिकीर्तयेत् । नमो भगवते कृत्वा समाहितमतिर्नरः ॥ ११३ ॥ भवत्यरोगो मतिमान् बलरूपसमन्वितः । आतुरो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११४ ॥ जो प्रतिदिन इसे सुनता है और जो भगवान्‌को नमस्कार करके एकाग्रचित्त हो सदा इसका पाठ करता है, वह बुद्धिमान्, बलवान्, रूपवान् तथा रोगरहित होता है। रोगी रोगसे और बँधा हुआ पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ११३-११४ ॥ कामान् कामी लभेत् कामं दीर्घं चायुरवाप्नुयात् । ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥ ११५ ॥ कामनावाला पुरुष मनोवांछित कामनाओंको पाता है तथा बड़ी भारी आयु प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता और क्षत्रिय विजयी होता है ॥ ११५ ॥ वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् । अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥ ११६ ॥ वैश्य इसको पढ़ने और सुननेसे महान् लाभका भागी होता है। शूद्र सुख पाता है। पुत्रहीनको पुत्र और कन्याको मनोवांछित पतिकी प्राप्ति होती है ॥ ११६ ॥ लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनयेत् सुतम् । वन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ॥ ११७ ॥ जिसका गर्भ अटक गया हो, वह इसको सुननेसे उस संकटसे छूट जाती है। गर्भवती स्त्री यथासमय पुत्र पैदा करती है। वन्ध्या भी प्रसवको प्राप्त होती है तथा उसका वह प्रसव पुत्र-पौत्र एवं समृद्धिसे सम्पन्न होता है ॥ ११७ ॥ क्षेमेण गच्छेदध्वानमिदं यः पठते पथि । यो यं कामं कामयते स तमाप्नोति च ध्रुवम् ॥ ११८ ॥

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