महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन ह्यन्यो वर्ण येन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो ॥ ७ ॥
अर्जुन बोले—भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके स्वामी, सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा, अविनाशी, जगदाधार तथा सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले जगन्नाथ, भगवन्, नारायणदेव! महर्षियोंने आपके जो-जो नाम कहे हैं तथा पुराणों और वेदोंमें कर्मानुसार जो-जो गोपनीय नाम पढ़े गये हैं, उन सबकी व्याख्या मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ। प्रभो! केशव! आपके सिवा दूसरा कोई उन नामोंकी व्युत्पत्ति नहीं बता सकता ॥ ५—७ ॥
श्रीभगवानुवाच
ऋग्वेदे सयजुर्वेदे तथैवाथर्वसामसु ।
पुराणे सोपनिषदे तथैव ज्यौतिषेऽर्जुन ॥ ८ ॥
सांख्ये च योगशास्त्रे च आयुर्वेदे तथैव च ।
बहूनि मम नामानि कीर्तितानि महर्षिभिः ॥ ९ ॥
श्रीभगवान्ने कहा—अर्जुन! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, उपनिषद्, पुराण, ज्योतिष, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र तथा आयुर्वेदमें महर्षियोंने मेरे बहुत-से नाम कहे हैं ॥ ८-९ ॥
गौणानि तत्र नामानि कर्मजानि च कानिचित् ।
निरुक्तं कर्मजानां त्वं शृणुष्व प्रयतोऽनघ ॥ १० ॥
उनमें कुछ नाम तो गुणोंके अनुसार हैं और कुछ कर्मोंसे हुए हैं। निष्पाप अर्जुन! तुम पहले एकाग्रचित होकर मेरे कर्मजनित नामोंकी व्याख्या सुनो ॥ १० ॥
कथ्यमानं मया तात त्वं हि मेऽर्धं स्मृतः पुरा ।
नमोऽतियशसे तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ ११ ॥
नारायणाय विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
तात! मैं तुमसे उन नामोंकी व्युत्पत्ति बताता हूँ, क्योंकि पूर्वकालसे ही तुम मेरे आधे शरीर माने गये हो। जो समस्त देहधारियोंके उत्कृष्ट आत्मा हैं, उन महायशस्वी, निर्गुण सगुणरूप विश्वात्मा भगवान् नारायणदेवको नमस्कार है ॥ ११ १/२ ॥
यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ॥ १२ ॥
योऽसौ योनिर्हि सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च ।
जिनके प्रसादसे ब्रह्मा और क्रोधसे रुद्र प्रकट हुए हैं, वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण चराचर जगत्की उत्पत्तिके कारण हैं ॥ १२ १/२ ॥
अष्टादशगुणं यत् तत् सत्त्वं सत्त्ववतां वर ॥ १३ ॥
प्रकृतिः सा परा मह्यं रोदसी योगधारिणी ।
ऋता सत्यामराजय्या लोकानामात्मसंज्ञिता ॥ १४ ॥