भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2312, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2312

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अठारह* गुणोंवाला जो सत्त्व है अर्थात् आदिपुरुष है, वही मेरी परा प्रकृति है। पृथ्वी और आकाशकी आत्मस्वरूपा वह योगबलसे समस्त लोकोंको धारण करनेवाली है। वही ऋता (कर्मफलभूत गतिस्वरूपा), सत्या (त्रिकालाबाधित ब्रह्मरूपा) अमर, अजेय तथा सम्पूर्ण लोकोंकी आत्मा है ।। १३-१४ ।। तस्मात् सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । तपो यज्ञश्च यष्टा च पुराणः पुरुषो विराट् ।। १५ ।। अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकानां प्रभवाप्ययः । उसीसे सृष्टि और प्रलय आदि सम्पूर्ण विकार प्रकट होते हैं। वही तप, यज्ञ और यजमान है, वही पुरातन विराट् पुरुष है, उसे ही अनिरुद्ध कहा गया है। उसीसे लोकोंकी सृष्टि और प्रलय होते हैं ।। १५ १/२ ।। ब्राह्मे रात्रिक्षये प्राप्ते तस्य ह्यमिततेजसः ।। १६ ।। प्रसादात् प्रादुरभवत् पद्मं पद्मानिभेक्षण । ततो ब्रह्मा समभवत् स तस्यैव प्रसादजः ।। १७ ।। जब प्रलयकी रात व्यतीत हुई थी, उस समय उन अमित तेजस्वी अनिरुद्धकी कृपासे एक कमल प्रकट हुआ। कमलनयन अर्जुन! उसी कमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। वे ब्रह्मा भगवान् अनिरुद्धके प्रसादसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। १६-१७ ।। अह्नः क्षये ललाटाच्च सुतो देवस्य वै तथा । क्रोधाविष्टस्य संजज्ञे रुद्रः संहारकारकः ।। १८ ।। ब्रह्माका दिन बीतनेपर क्रोधके आवेशमें आये हुए उस देवके ललाटसे उनके पुत्ररूपमें संहारकारी रुद्र प्रकट हुए ।। १८ ।। एतौ द्वौ विबुधश्रेष्ठौ प्रसादक्रोधजावुभौ । तदादेशितपन्थानौ सृष्टिसंहारकारकौ ।। १९ ।। ये दोनों श्रेष्ठ देवता—ब्रह्मा और रुद्र भगवान्के प्रसाद और क्रोधसे प्रकट हुए हैं तथा उन्हींके बताये हुए मार्गका आश्रय ले सृष्टि और संहारका कार्य पूर्ण करते हैं ।। १९ ।। निमित्तमात्रं तावत्र सर्वप्राणिवरप्रदौ । कपर्दी जटिलो मुण्डः श्मशानगृहसेवकः ।। २० ।। उग्रव्रतचरो रुद्रो योगी परमदारुणः । दक्षक्रतुहरश्चैव भगनेत्रहरस्तथा ।। २१ ।। समस्त प्राणियोंको वर देनेवाले वे दोनों देवता सृष्टि और प्रलयके निमित्तमात्र हैं। (वास्तवमें तो वह सब कुछ भगवान्की इच्छासे ही होता है।) इनमेंसे संहारकारी रुद्रके कपर्दी (जटाजूटधारी), जटिल, मुण्ड, श्मशानगृहका सेवन करनेवाले, उग्र व्रतका आचरण