भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2313

करनेवाले, रुद्र, योगी, परम दारुण, दक्षयज्ञ-विध्वंसक तथा भगनेत्रहारी आदि अनेक नाम हैं ॥ २०-२१ ॥

नारायणात्मको ज्ञेयः पाण्डवेय युगे युगे । तस्मिन् हि पूज्यमाने वै देवदेवे महेश्वरे ॥ २२ ॥ सम्पूजितो भवेत् पार्थ देवो नारायणः प्रभुः । पाण्डुनन्दन! इन भगवान् रुद्रको नारायणस्वरूप ही जानना चाहिये। पार्थ! प्रत्येक युगमें उन देवाधिदेव महेश्वरकी पूजा करनेसे सर्वसमर्थ भगवान् नारायणकी ही पूजा होती है ॥ २२ १/२ ॥

अहमात्मा हि लोकानां विश्वेषां पाण्डुनन्दन ॥ २३ ॥ तस्मादात्मानमेवाग्रे रुद्रं सम्पूजयाम्यहम् । पाण्डुकुमार! मैं सम्पूर्ण जगत्‌का आत्मा हूँ। इसलिये मैं पहले अपने आत्मारूप रुद्रकी ही पूजा करता हूँ ॥ २३ १/२ ॥

यद्यहं नार्चयेयं वै ईशानं वरदं शिवम् ॥ २४ ॥ आत्मानं नार्चयेत् कश्चिदिति मे भावितात्मनः । यदि मैं वरदाता भगवान् शिवकी पूजा न करूँ तो दूसरा कोई भी उन आत्मारूप शंकरका पूजन नहीं करेगा, ऐसी मेरी धारणा है ॥ २४ १/२ ॥

मया प्रमाणं हि कृतं लोकः समनुवर्तते ॥ २५ ॥ प्रमाणानि हि पूज्यानि ततस्तं पूजयाम्यहम् । यस्तं वेत्ति स मां वेत्ति योऽनुतं स हि मामनु ॥ २६ ॥ मेरे किये हुए कार्यको प्रमाण या आदर्श मानकर सब लोग उसका अनुसरण करते हैं। जिनकी पूजनीयता वेदशास्त्रोंद्वारा प्रमाणित है, उन्हीं देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा सोचकर ही मैं रुद्रदेवकी पूजा करता हूँ। जो रुद्रको जानता है, वह मुझे जानता है। जो उनका अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है ॥

रुद्रो नारायणश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम् । लोके चरति कौन्तेय व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु ॥ २७ ॥ कुन्तीनन्दन! रुद्र और नारायण दोनों एक ही स्वरूप हैं, जो दो स्वरूप धारण करके भिन्न-भिन्न व्यक्तियोंमें स्थित हो संसारमें यज्ञ आदि सब कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ २७ ॥

न हि मे केनचिद् देयो वरः पाण्डवनन्दन । इति संचिन्त्य मनसा पुराणं रुद्रमीश्वरम् ॥ २८ ॥ पुत्रार्थमाराधितवानहमात्मानमात्मना । पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले अर्जुन! मुझे दूसरा कोई वर नहीं दे सकता; यही सोचकर मैंने पुत्र-प्राप्तिके लिये स्वयं ही अपने आत्मारूप पुराणपुरुष जगदीश्वर रुद्रकी आराधना की थी ॥ २८ १/२ ॥