महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2314, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन हि विष्णुः प्रणमति कस्मैचिद् विबुधाय च ॥ २९ ॥ ऋते आत्मानमेवेति ततो रुद्रं भजाम्यहम्। विष्णु अपने आत्मस्वरूप रुद्रके सिवा किसी दूसरे देवताको प्रणाम नहीं करते; इसलिये मैं रुद्रका भजन करता हूँ॥ २९ १/२ ॥
सब्रह्मकाः सरुद्राश्च सेन्द्रा देवाः सहर्षिभिः ॥ ३० ॥ अर्चयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम्। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता सुरश्रेष्ठ नारायणदेव श्रीहरिकी अर्चना करते हैं॥ ३० १/२ ॥
भविष्यतां वर्ततां च भूतानां चैव भारत ॥ ३१ ॥ सर्वेषामग्रणीर्विष्णुः सेव्यः पूज्यश्च नित्यशः। भरतनन्दन! भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें होनेवाले समस्त पुरुषोंके भगवान् विष्णु ही अग्रगण्य हैं; अतः सबको सदा उन्हींकी सेवा-पूजा करनी चाहिये॥ ३१ १/२ ॥
नमस्व हव्यदं विष्णुं तथा शरणदं नम ॥ ३२ ॥ वरदं नमस्व कौन्तेय हव्यकव्यभुजं नम। कुन्तीकुमार! तुम हव्यदाता विष्णुको नमस्कार करो, शरणदाता श्रीहरिको शीश झुकाओ, वरदाता विष्णुकी वन्दना करो तथा हव्यकव्यभोक्ता भगवान्को प्रणाम करो॥ ३२ १/२ ॥
चतुर्विधा मम जना भक्ता एव हि मे श्रुतम् ॥ ३३ ॥ तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवताः। अहमेव गतिस्तेषां निराशीः कर्मकारिणाम् ॥ ३४ ॥ तुमने मुझसे सुना है कि आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार प्रकारके मनुष्य मेरे भक्त हैं। इनमें जो एकान्ततः मेरा ही भजन करते हैं, दूसरे देवताओंको अपना आराध्य नहीं मानते हैं, वे सबसे श्रेष्ठ हैं। निष्कामभावसे समस्त कर्म करनेवाले उन भक्तोंकी परमगति मैं ही हूँ॥
ये च शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः। सर्वे च्यवनधर्माणस्ते प्रतिबुद्धस्तु श्रेष्ठभाक् ॥ ३५ ॥ जो शेष तीन प्रकारके भक्त हैं, वे फलकी इच्छा रखनेवाले माने गये हैं। अतः वे सभी नीचे गिरनेवाले होते हैं—पुण्यभोगके अनन्तर स्वर्गादिलोकोंसे च्युत हो जाते हैं, परंतु ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ फल (भगवत्प्राप्ति)का भागी होता है॥ ३५॥
ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः। प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत् परम् ॥ ३६ ॥