भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2315

ज्ञानी भक्त ब्रह्मा, शिव तथा दूसरे देवताओंकी निष्काम भावसे सेवा करते हुए भी अन्तमें मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं ।। ३६ ।। भक्तं प्रति विशेषस्ते एष पार्थानुकीर्तितः । त्वं चैवाहं च कौन्तेय नरनारायणौ स्मृतौ ।। ३७ ।। भारावतरणार्थं तु प्रविष्टौ मानुषीं तनुम् । पार्थ! यह मैंने तुमसे भक्तोंका अन्तर बतलाया है। कुन्तीनन्दन! तुम और मैं दोनों ही नर-नारायण नामक ऋषि हैं और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये हमने मानव-शरीरमें प्रवेश किया है ।। ३७ १/२ ।। जानाम्यध्यात्मयोगांश्च योऽहं यस्माच्च भारत ।। ३८ ।। निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽभ्युदयिकोऽपि च । नराणामयनं ख्यातमहमेकः सनातनः ।। ३९ ।। भारत! मैं अध्यात्मयोगोंको जानता हूँ तथा मैं कौन हूँ और कहाँसे आया हूँ—इस बातका भी मुझे ज्ञान है। लौकिक अभ्युदयका साधक प्रवृत्तिधर्म ओर निःश्रेयस प्रदान करनेवाला निवृत्तिधर्म भी मुझसे अज्ञात नहीं है। एकमात्र मैं सनातन पुरुष ही सम्पूर्ण मनुष्योंका सुविख्यात आश्रयभूत नारायण हूँ ।। ३८-३९ ।। आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । अयनं मम तत् पूर्वमतो नारायणो ह्यहम् ।। ४० ।। नरसे उत्पन्न होनेके कारण जलको नार कहा गया है। वह नार (जल) पहले मेरा अयन (निवासस्थान) था; इसलिये ही मैं ‘नारायण’ कहलाता हूँ ।। ४० ।। छादयामि जगद् विश्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ।। ४१ ।। (जो सबमें व्याप्त हो अथवा जो किसीका निवासस्थान हो, उसे ‘वासु’ कहते हैं) मैं ही सूर्यरूप धारण करके अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करता हूँ तथा मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका वासस्थान हूँ; इसलिये मेरा नाम ‘वासुदेव’ है ।। ४१ ।। गतिश्च सर्वभूतानां प्रजननश्चापि भारत । व्याप्ता मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ।। ४२ ।। अधिभूतानि चान्तेषु तदिच्छंश्चास्मि भारत । क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः ।। ४३ ।। भारत! मैं सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति और उत्पत्तिका स्थान हूँ। पार्थ! मैंने आकाश और पृथ्वीको व्याप्त कर रखा है। मेरी कान्ति सबसे बढ़कर है। भरतनन्दन! समस्त प्राणी अन्तकालमें जिस ब्रह्मको पानेकी इच्छा करते हैं, वह भी मैं ही हूँ। कुन्तीकुमार! मैं सबका अतिक्रमण करके स्थित हूँ। इन सभी कारणोंसे मेरा नाम ‘विष्णु’ हुआ है* ।। ४२-४३ ।।