भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2316, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2316

दमात् सिद्धिं परीप्सन्तो मां जनाः कामयन्ति ह । दिवं चोर्वीं च मध्यं च तस्माद् दामोदरो ह्यहम् ॥ ४४ ॥ मनुष्य दम (इन्द्रियसंयम) के द्वारा सिद्धि पानेकी इच्छा करते हुए मुझे पाना चाहते हैं तथा दमके द्वारा ही वे पृथ्वी, स्वर्ग एवं मध्यवर्ती लोकोंमें ऊँची स्थिति पानेकी अभिलाषा करते हैं, इसलिये मैं 'दामोदर' कहलाता हूँ ('दम एव दामः तेन उदीर्यति—उन्नतिं प्राप्नोति यस्मात् स दामोदरः'—यह दामोदर शब्दकी व्युत्पत्ति है) ॥ ४४ ॥

पृश्निरित्युच्यते चान्नं वेद आपोऽमृतं तथा । ममैतानि सदा गर्भः पृश्निगर्भस्ततो ह्यहम् ॥ ४५ ॥ अन्न, वेद, जल और अमृतको पृश्नि कहते हैं। ये सदा मेरे गर्भमें रहते हैं; इसलिये मेरा नाम 'पृश्निगर्भ' है ॥

ऋषयः प्राहुरेवं मां त्रितं कूपनिपातितम् । पृश्निगर्भ त्रितं पाहीत्येकतद्वितपातितम् ॥ ४६ ॥ ततः स ब्रह्मणः पुत्र आद्यो ऋषिवरस्त्रितः । उत्ततारोदपानाद् वै पृश्निगर्भानुकीर्तनात् ॥ ४७ ॥ जब त्रितमुनि अपने भाइयोंद्वारा कुएँमें गिरा दिये गये, उस समय ऋषियोंने मुझसे इस प्रकार प्रार्थना की—'पृश्निगर्भ! आप एकत और द्वितके गिराये हुए त्रितको डूबनेसे बचाइये।' उस समय मेरे पृश्निगर्भ नामका बारंबार कीर्तन करनेसे ब्रह्माजीके आदि पुत्र ऋषिप्रवर त्रित उस कुएँसे बाहर हो गये ॥ ४६-४७ ॥

सूर्यस्य तपतो लोकानग्नेः सोमस्य चाप्युत । अंशवो यत् प्रकाशन्ते ममैते केशसंज्ञिताः ॥ ४८ ॥ सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्मामाहुर्द्विजसत्तमाः । जगत्को तपानेवाले सूर्यकी तथा अग्नि और चन्द्रमाकी जो किरणें प्रकाशित होती हैं, वे सब मेरा केश कहलाती हैं। उस केशसे युक्त होनेके कारण सर्वज्ञ द्विजश्रेष्ठ मुझे 'केशव' कहते हैं ॥ ४८ ॥

एवं हि वरदं नाम केशवेति ममार्जुन । देवानाम्थ सर्वेषामृषीणां च महात्मनाम् ॥ ४९ ॥ अर्जुन! इस प्रकार मेरा 'केशव' नाम सम्पूर्ण देवताओं और महात्मा ऋषियोंके लिये वरदायक है ॥

अग्निः सोमेन संयुक्त एकयोनित्वमागतः । अग्नीषोममयं तस्माज्जगत् कृत्स्नं चराचरम् ॥ ५० ॥ अग्नि सोमके साथ संयुक्त हो एक योनिको प्राप्त हुए, इसलिये सम्पूर्ण चराचर जगत् अग्नि-सोममय है ॥ ५० ॥