भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2317, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2317

अपि हि पुराणे भवति एकयोन्यात्मकावग्नीषोमौ देवाश्चाग्निमुखा इति एकयोनित्वाच्च परस्परमर्हन्तो लोकान् धारयन्त इति ॥ ५१ ॥

पुराणमें यह कहा गया है कि अग्नि और सोम एकयोनि हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंके मुख अग्नि हैं। एकयोनि होनेके कारण ये एक-दूसरेको आनन्द प्रदान करते और समस्त लोकोंको धारण करते हैं ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४१ ॥

इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४१ ॥


* प्रीति, प्रकाश, उत्कर्ष, हलकापन, सुख, कृपणताका अभाव, रोषका अभाव, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धृति, अहिंसा, शौच, अक्रोध, सरलता, समता, सत्य तथा दोषदृष्टिका अभाव—ये सत्त्वके अठारह गुण हैं।
* ‘विच्छ गतौ’ (तुदादि), ‘विच्छ दीप्तौ’ (चुरादि), ‘विषु सेचने’ (भ्वादि), ‘विषॢ व्याप्तौ’ (जुहोत्यादि), ‘विश प्रवेशने’ (तुदादि), ‘ष्णु प्रस्रवणे’ (अदादि)—इन सभी धातुओंसे ‘विष्णु’ शब्दकी सिद्धि होती है, अतः गति, दीप्ति, सेचन, व्याप्ति, प्रवेश तथा प्रस्रवण—ये सभी अर्थ ‘विष्णु’ शब्दमें निहित हैं।

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