महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2319, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतस्तस्मात् पुरुषः प्रादुर्भूतो हरिरव्ययः ।। ६ ।।
इस अवस्थामें नारायणके गुणोंका आश्रय लेकर रहनेवाले उस अजर, अमर,
इन्द्रियरहित, अग्राह्य, असम्भव, सत्यस्वरूप, हिंसारहित, सुन्दर, नाना प्रकारकी विशेष
प्रवृत्तियोंके हेतुभूत, वैररहित, अक्षय, अमर, जरारहित, निराकार, सर्वव्यापी तथा सर्वकर्ता
सत्त्वसे अविनाशी सनातन पुरुष हरिका प्रादुर्भाव हुआ ।। ६ ।।
निदर्शनमपि ह्यत्र भवति ।। ७ ।।
इस विषयमें श्रुतिका यह दृष्टान्त भी है ।। ७ ।।
नासीदहो न रात्रिरासीन्न सदासीन्नासदासीत् तम एव पुरस्तादभवद् विश्वरूपम् ।
सा विश्वरूपस्य रजनी हि एवमस्यार्थोऽनुभाष्यः ।। ८ ।।
उस प्रलयकालमें न दिन था न रात थी, न सत् था न असत् था, केवल तम ही सामने
था। वही सर्वरूप हो रहा था। वही विश्वात्माकी रात्रि है। इस प्रकार इस श्रुतिका अर्थ कहना
और समझना चाहिये ।। ८ ।।
तस्येदानीं तमसः सम्भवस्य पुरुषस्य ब्रह्मयोनेर्ब्रह्मणः प्रादुर्भावे स पुरुषः प्रजाः
सिसृक्षमाणो नेत्राभ्यामग्नीषोमौ ससर्ज । ततो भूतसर्गेषु सृष्टेषु प्रजाक्रमवशाद्
ब्रह्मक्षत्रमुपातिष्ठत् । यः सोमस्तद् ब्रह्म यद् ब्रह्म ते ब्राह्मणा योऽग्निस्तत् क्षत्रं क्षत्राद्
ब्रह्म बलवत्तरम् । कस्मादिति लोकप्रत्यक्षगुणमेतत्तद्यथा । ब्राह्मणेभ्यः परं भूतं
नोत्पन्नपूर्वं दीप्यमानेऽग्नौ जुहोति । यो ब्राह्मणमुखे जुहोतीति कृत्वा ब्रवीमि भूतसर्गः
कृतो ब्रह्मणा भूतानि च प्रतिष्ठाप्य त्रैलोक्यं धार्यत इति मन्त्रवादोऽपि हि
भवति ।। ९ ।।
उस समय उस मायाविशिष्ट ईश्वरसे प्रकट हुए उस ब्रह्मयोनि पुरुषसे जब ब्रह्माजीका
प्रादुर्भाव हुआ, तब उस पुरुषने प्रजासृष्टिकी इच्छासे अपने नेत्रोंद्वारा अग्नि और सोमको
उत्पन्न किया। इस प्रकार भौतिक सर्गकी सृष्टि हो जानेपर प्रजाकी उत्पत्तिके समय क्रमशः
ब्रह्म और क्षत्रका प्रादुर्भाव हुआ। जो सोम है, वही ब्रह्म है और जो ब्रह्म है, वही ब्राह्मण। जो
अग्नि है, वही क्षत्र या क्षत्रिय जाति है। क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति अधिक प्रबल है। यदि कहो,
कैसे? तो इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मणकी यह प्रबलताका गुण सब लोगोंको प्रत्यक्ष है।
यथा ब्राह्मणसे बढ़कर कोई प्राणी पहले कभी उत्पन्न नहीं हुआ। जो ब्राह्मणके मुखमें
भोजन देता है, वह मानो प्रज्वलित अग्निमें आहुति प्रदान करता है। यही सोचकर मैं ऐसा
कहता हूँ। ब्रह्माने भूतोंकी सृष्टि की और सम्पूर्ण भूतोंको यथास्थान स्थापित करके वे तीनों
लोकोंको धारण करते हैं। यह मन्त्रवाक्य भी इसी बातका समर्थक है ।। ९ ।।
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितो देवानां मानुषाणां च जगत इति ।। १० ।।
अग्ने! तुम यज्ञोंके होता तथा सम्पूर्ण देवताओं, मनुष्यों और सारे जगत्के हितैषी
हो ।। १० ।।