महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2320, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिदर्शनं चात्र भवति विश्वेषामग्ने यज्ञानां त्वं होतेति । त्वं हितो देवैर्मनुष्यैर्जगत् इति ॥ ११ ॥ इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—हे अग्निदेव! तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके होता हो। समस्त देवताओं तथा मनुष्योंसहित जगत्के हितैषी हो ॥ ११ ॥
अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निर्ब्रह्म ॥ १२ ॥ अग्निदेव यज्ञोंके होता और कर्ता हैं। वे अग्निदेव ब्राह्मण हैं ॥ १२ ॥
न ह्यृते मन्त्राणां हवनमस्ति न विना पुरुषं तपः सम्भवति । हविर्मन्त्राणां सम्पूजा विद्यते देवमानुष-ऋषीणामनेन त्वं होतेति नियुक्तः । ये च मानुष-होत्राधिकारास्ते च ब्राह्मणस्य हि याजनं विधीयते न क्षत्रवैश्ययोर्द्विजात्योस्तस्माद् ब्राह्मणा ह्यग्निभूता यज्ञानुद्वहन्ति । यज्ञास्ते देवांस्तर्पयन्ति देवाः पृथिवीं भावयन्ति शतपथेऽपि हि ब्राह्मणमुखे भवति ॥ १३ ॥ क्योंकि मन्त्रोंके बिना हवन नहीं होता और पुरुषके बिना तपस्या सम्भव नहीं होती। हविष्ययुक्त मन्त्रोंके सम्बन्धसे देवताओं, मनुष्यों और ऋषियोंकी पूजा होती है; इसलिये हे अग्निदेव! तुम होता नियुक्त किये गये हो। मनुष्योंमें जो होताके अधिकारी हैं, वे ब्राह्मणके ही हैं; क्योंकि उसीके लिये यज्ञ करानेका विधान है। द्विजातियोंमें जो क्षत्रिय और वैश्य हैं, उन्हें यज्ञ करानेका अधिकार नहीं है; इसलिये अग्निस্বরূপ ब्राह्मण ही यज्ञोंका भार वहन करते हैं। वे यज्ञ देवताओंको तृप्त करते हैं और देवता भूमण्डलको धन-धान्यसे सम्पन्न बनाते हैं। शतपथब्राह्मणमें भी ब्राह्मणके मुखमें आहुति देनेकी बात कही गयी है ॥ १३ ॥
अग्नौ समिद्धे स जुहोति यो विद्वान् ब्राह्मण-मुखेनाहुतिं जुहोति ॥ १४ ॥ जो विद्वान् ब्राह्मणके मुखरूपी अग्निमें अन्नकी आहुति देता है, वह मानो प्रज्वलित अग्निमें होम करता है ॥ १४ ॥
एवमप्यग्निभूता ब्राह्मणा विद्वांसोऽग्निं भावयन्ति । अग्निर्विष्णुः सर्वभूतान्यनुप्रविश्य प्राणान् धारयति ॥ १५ ॥ इस प्रकार ब्राह्मण अग्निस্বরূপ हैं। विद्वान् ब्राह्मण अग्निकी आराधना करते हैं। अग्निदेव विष्णु हैं। वे समस्त प्राणियोंके भीतर प्रवेश करके उनके प्राणोंको धारण करते हैं ॥ १५ ॥
अपि चात्र सनत्कुमारगीताः श्लोका भवन्ति—
ब्रह्मा विश्वं सृजत् पूर्वं सर्वादिर्निर्वस्कृतम् ।
ब्रह्मघोषैर्दिवं गच्छन्त्यमरा ब्रह्मयोनयः ॥ १६ ॥
इसके सिवा इस विषयमें सनत्कुमारजीके द्वारा गाये हुए श्लोक भी उपलब्ध होते हैं। सबके आदिकारण ब्रह्माजीने (जो ब्राह्मण ही हैं) पहले निर्मल विश्वकी सृष्टि की थी। ब्रह्म ही जिनकी उत्पत्तिके स्थान हैं, वे अमर देवता ब्राह्मणोंकी वेदध्वनिसे ही स्वर्गलोकको जाते हैं ॥ १६ ॥