भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2328

अथेन्द्राणीमभ्यागतां दृष्ट्वा तामुवाच नहुषः पूर्णः स काल इति तं शच्यब्रवीच्छक्रेण यथोक्तं स महर्षियुक्तं वाहनमधिरूढः शचीसमीपमुपागच्छत् ॥ ५० ॥ इन्द्राणीको आयी हुई देख नहुषने उससे कहा—‘देवि! तुमने जो समय दिया था, वह पूरा हो गया है।’ तब शचीने इन्द्रके बताये अनुसार सारी बातें कह सुनायीं। नहुष महर्षियोंसे जुते हुए वाहनपर आरूढ़ हो शचीके समीप चले ॥ ५० ॥ अथ मैत्रावरुणिः कुम्भयोनिरगस्त्य ऋषिवरो महर्षीन् धिक्क्रियमाणांस्तान् नहुषेणापश्यत् पद्भ्यां च तेनास्पृश्यत ततः स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीं सर्पो भव यावद्भूमिर्गिरयश्च तिष्ठेयुस्तावदिति स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद् यानादवापतत् ॥ ५१ ॥ इसी समय मित्रावरुणके पुत्र कुम्भज मुनिवर अगस्त्यने देखा कि नहुष महर्षियोंको तीव्र गतिसे चलनेके लिये धिक्कार और फटकार रहा है। उसने अगस्त्यके शरीरमें भी दोनों पैरोंसे धक्के दिये। तब अगस्त्यने नहुषसे कहा—‘न करने योग्य नीच कर्ममें प्रवृत्त हुए पापी नहुष! तू अभी पृथ्वीपर गिर जा तथा जबतक पृथ्वी और पर्वत स्थिर रहें, तबतकके लिये सर्प हो जा।’ महर्षिके इतना कहते ही नहुष उस वाहनसे नीचे गिर पड़ा ॥ ५१ ॥ अथानिन्द्रं पुनस्त्रैलोक्यमभवत् ततो देवा ऋषयश्च भगवन्तं विष्णुं शरणमिन्द्रार्थेऽभिजग्मुरूचुश्चैनं भगवन्निन्द्रं ब्रह्महत्याभिभूतं त्रातुमर्हसीति ततः स वरदस्तानब्रवीदश्वमेधं यज्ञं वैष्णवं शक्रोऽभियजतां ततः स्वस्थानं प्राप्स्यतीति ततो देवा ऋषयश्चेन्द्रं नापश्यन् यदा तदा शचीमूचुर्गच्छ सुभगे इन्द्रमानयस्वेति सा पुनस्तत्सरः समभ्यगच्छदिन्द्रश्च तस्मात् सरसः प्रत्युत्थाय बृहस्पतिमभिजगाम बृहस्पतिश्चाश्वमेधं महाक्रतुं शक्रायाहरत् तत्र कृष्णसारङ्गं मेध्यमश्वमुत्सृज्य वाहनं तमेव कृत्वा इन्द्रं मरुत्पतिं बृहस्पतिः स्वं स्थानं प्रापयामास ॥ ५२ ॥ नहुषका पतन हो जानेपर त्रिलोकीका राज्य पुनः बिना इन्द्रके हो गया, तब देवता और ऋषि इन्द्रके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उनसे बोले—‘भगवन्! ब्रह्महत्यासे पीड़ित हुए इन्द्रकी रक्षा कीजिये’ तब वरदायक भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे कहा —‘देवगण! इन्द्र विष्णुके उद्देश्यसे अश्वमेध यज्ञ करें। तब वे फिर अपना स्थान प्राप्त करेंगे।’ यह सुनकर देवता और महर्षि इन्द्रको ढूँढ़ने लगे। जब वे कहीं उनका पता न पा सके, तब वे शचीसे बोले—‘सुभगे! तुम्हीं जाओ और इन्द्रको यहाँ ले आओ।’ तब शची पुनः मानसरोवरपर गयीं। शचीके कहनेसे इन्द्र उस सरोवरसे निकलकर बृहस्पतिजीके पास आये। बृहस्पतिजीने इन्द्रके लिये अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें उन्होंने कृष्णसारंग नामक यज्ञिय अश्वको छोड़ा था। उसीको वाहन बनाकर बृहस्पतिने पुनः देवराज इन्द्रको अपने पदपर प्रतिष्ठित किया ॥ ५२ ॥